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Showing posts from 2019

युद्ध समाधान नही हो सकता कभी भी नही!

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युद्ध समाधान नही हो सकता कभी भी नही! मेरी एक दोस्त है, ग्रेजुएशन के दिनों की। वो हम सब दोस्तों में सबसे खुशमिजाज लड़की थी। पेपर देने के बाद जहाँ हम सब टेंसन में रहते थे और वो, वो पेपर के बाद हर रोज़ हमें गोपेश्वर (चमोली, उत्तराखंड) के शंग्रीला होटल में छोले समोशे खाने ले जाती थी। जिंदगी से भरपूर। हमारे पास करिअर को लेकर तब एक या दो गोल थे उस के पास 8-10 होते थे। और उसने कैरियर ऑप्शन के लिए BSc PCM करने के साथ ही 12वीं बायोलॉजी से भी डाला था ताकि मेडिकल का ऑप्शन भी उसके पास हो जाय। इसी के चलते एक साल बाद वो देहरादून मेडिकल का कोई कोर्स करने चली गयी। और अगले दो साल में उसकी शादी भी हो गयी।  हमें उस वक्त लगा था ये जल्दी है पर वो खुश थी। शादी जल्दी करने  का कारण पूछा तो उसने कहा लड़का एयर फोर्स में है और बहुत अच्छा है तो कर ली। मेरी उस से मुलाकात नही हुई बहुत समय से, लेकिन फेसबुक पर उसकी सुंदर सुंदर फ़ोटो देख हम सब दोस्त खुश होते थे।      अब अभी 20 दिन पहले उसके पति के ऑन ड्यूटी मृत्यु की खबर एक दोस्त ने बताई।  जैसे ही दोस्त ने ये बात बताई मेरे सामने व...

जलियाँवाला बाग हत्याकांड के 101 साल : इतिहास के आईने में

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1919 का साल भारत सहित पूरी दुनिया के लिए के असन्तोष का था। देश मे फैल रही आज़ादी की लड़ाई और क्रांतिकारीयों को कुचलने के लिए ब्रिटेन को प्रथम विश्व युद्ध के बाद फिर से शक्ति की जरूरत थी, क्योंकि भारत के रक्षा अधिनियम (जिसे प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार विरोधी तत्वों के दमन पास किया था) की अवधि समाप्त हो रही थी। और आन्दोलनकारियों की गतिविधियाँ लगातार बढ़ती जा रही थी, जो कि अंग्रेज सरकार के लिए खतरे की घण्टी थी। इसलिए इन ब्रिटिश सरकार विरोधी आंदोलनों, इनके प्रभावों और आज़ादी के दीवानों की क्रांतिकारी गतिविधियों से निपटने के उपायों के लिए अंग्रेजों ने सर सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्ति की गयी। रॉलेट समिति की सिफारिशों के आधार पर 17 मार्च 1919 में ब्रिटिश सरकार ने केंद्रीय विधान परिषद में एक-एक भारतीय सदस्य द्वारा विरोध करने के बावजूद रॉलेट एक्ट पास कर दिया।   रॉलेट एक्ट के द्वारा व्यवस्था की गई कि - ◆ जिस व्यक्ति पर राजद्रोही ( ब्रिटिश सरकार के खिलाफ कोई भी गतिविधि करने जैसे बोलने, लिखने, सभा करने ) होने का संदेह हो, उसकी गतिविधियों पर नियंत्रण रखा जाय, उन...

उत्तराखंड में आधी आबादी की असुरक्षा

         उत्तराखंड का नाम आते ही पहाड़ और पहाड़ में पहाड़ जैसा जीवन जीने वाली महिलाओं की तस्वीर आती है। जो पहाड़ को सींचती-सवारती है। पहाड़ का हर कंकड़ पत्थर महिलाओं के संघर्ष की कहानी सुनाता है। वो जंगलों से घास भी लाती है तो खेती किसानी भी उसी के जिम्मे होती है। यही पहाड़ महिलाओं के लिए शांत और सुरक्षित माने जाते थे। उसमे से पहाड़ की शांत फिजायें तो और भी सुरक्षित मानी जाती थी। लेकिन छोटी बच्चियों और महिलाओं के साथ लगातार हो रही घटनाएँ और विभिन्न संस्थाओं के द्वारा दिए जा रहे आँकड़े पहाड़ की इन शांत वादियों की कुछ और ही तस्वीर सामने रख रहे है| इन अलग आती तस्वीरों में महिला सुरक्षा के नाम पर होने वाले तमाम कार्यक्रमों के खोखलेपन व केवल कागजों, भाषणों और नारों तक ही सीमित होने की तस्वीर भी साफ दिखती है| बीते दिसम्बर महीने में हुई दो अलग अलग घटनाओं में पहाड़ ने न केवल पहाड़ बल्कि पूरे देश को, महिलाओँ के लिए अपने असुरक्षित होने की खबर दी। 16 दिसम्बर को न केवल भारत बल्कि दुनियाभर को हिला देने वाले “निर्भयाकांड” के 6 साल पूरे होने के दिन ही पौड़ी की एक 18 वर्षीय...