
1919 का साल भारत सहित पूरी दुनिया के लिए के असन्तोष का था। देश मे फैल
रही आज़ादी की लड़ाई और क्रांतिकारीयों को कुचलने के लिए ब्रिटेन को प्रथम विश्व युद्ध
के बाद फिर से शक्ति की जरूरत थी, क्योंकि भारत के रक्षा अधिनियम (जिसे प्रथम विश्व
युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार विरोधी तत्वों के दमन पास किया था) की अवधि समाप्त हो
रही थी। और आन्दोलनकारियों की गतिविधियाँ लगातार बढ़ती जा रही थी, जो कि अंग्रेज सरकार
के लिए खतरे की घण्टी थी। इसलिए इन ब्रिटिश सरकार विरोधी आंदोलनों, इनके प्रभावों और
आज़ादी के दीवानों की क्रांतिकारी गतिविधियों से निपटने के उपायों के लिए अंग्रेजों
ने सर सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्ति की गयी। रॉलेट समिति की सिफारिशों
के आधार पर 17 मार्च 1919 में ब्रिटिश सरकार ने केंद्रीय विधान परिषद में एक-एक भारतीय
सदस्य द्वारा विरोध करने के बावजूद रॉलेट एक्ट पास कर दिया।
रॉलेट एक्ट के द्वारा व्यवस्था की गई कि -◆जिस व्यक्ति पर राजद्रोही ( ब्रिटिश सरकार के खिलाफ कोई भी गतिविधि करने
जैसे बोलने, लिखने, सभा करने ) होने का संदेह हो, उसकी गतिविधियों पर नियंत्रण रखा
जाय, उन पर मुकदमा और गिरफ्तार किया जा सकता है।◆ ऐसी किसी भी प्रकार की सामग्री के प्रकाशन को, जिससे जनता में रोष की भावना
फैले, अपराध माना जाय। ◆किसी को भी ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बोलने, लिखने या सभा करने जैसी गतिविधियों
के लिए जेल में डाला जा सकता था। और 2 साल तक बिना किसी अदालती कार्यवाही के कैद किया
जा सकता था (‘न वकील, न दलील, न अपील’)
रॉलेट एक्ट के विरोध गाँधी, नेहरू
से लेकर बड़े बड़े नेताओं ने किया। गाँधी ने कहा कि- "ये कानून अन्यायपूर्ण है,
स्वतन्त्रता तथा न्याय के सिद्धांतों और व्यक्तियों के बुनियादी अधिकारों के लिए, जिन
पर सम्पूर्ण समाज तथा स्वयं राज्य की सुरक्षा आधारित है, घातक और विध्वंसकारी है।"
पूरे देश मे इस दमनकारी कानून के खिलाफ
लोग एक जुट होने लगे। गाँधी ने 30 मार्च और 6 अप्रैल को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान
किया। 30 मार्च को दिल्ली में स्वामी श्रद्धानन्द के नेतृत्व में जा रहे जुलूस पर पुलिस
ने गोलियाँ चलाई। पाँच आंदोलनकारी तत्काल मर गए और कई घायल हुए। इस से आंदोलन की आग
ज्यादा तेजी से फैली और पंजाब, कलकत्ता और दिल्ली में 6 अप्रैल के प्रदर्शन के लिए
तैयारियाँ ज्यादा जोश के साथ हुई। लगभग पूरा देश एक नई ऊर्जा से भर उठा। हड़तालें, काम
रोको अभियान, जुलूस और प्रदर्शन होने लगे। हिन्दू-मुश्लिम एकता के नारे हवाओं से गूँजने
लगे।
अमृतसर में सत्याग्रह के समर्थन में
सभाएँ हुई। इन सभी सभाओं में पंजाब के नेताओं को भाषण देने तक की मनाही हो गयी। 10
अप्रैल को अमृतसर में डॉ० सैफुद्दीन किचलू और डॉ० सत्यपाल को गिरफ्तार कर लिया गया।
इन नेताओं की गिरफ्तारी का सभी जगह विरोध किया गया। विद्रोह के दमन के लिए फौजी कमांडर
जनरल डायर को नियुक्त किया गया.
ये बैसाखी का दिन
था। पंजाब में बैसाखी का त्यौहार बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। अमृतसर के प्रसिद्ध
स्वर्ण मंदिर में आये पंजाबी परिवार कुछ दूरी पर स्थित जलियांवाला बाग में घूमने-टहलने
के लिए भी गए थे। कोई त्यौहार की थकान से लोट-पोट हो सुस्ता रहा था तो बच्चे भीड़ के
मज़े ले रहे थे। जिस से उस दिन बाग में भीड़ करीब बीस हज़ार बताई जाती है (इस पर अलग अलग
इतिहासकारों की अलग अलग राय है)। रॉलेट एक्ट और नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में
13 अप्रैल को जलियांवाला बाग में एक सभा बुलाई गई थी। जिसकी जानकारी उस वक्त
बाग में मौजूद आधे से ज्यादा लोगों को नही थी। जनरल डायर को दिन के 12-12.30 बजे
इस सभा का पता चला। सभा को डायर ने गैर कानूनी घोषित कर दिया। और गुस्साया डायर अपनी
सैन्य टुकड़ी के साथ बाग में पहुँच गया। जलियाँवाला बाग में जाने के लिए केवल एक रास्ता
है और पूरा बाग 10-10 फिट ऊँची दीवारों से घिरा है।जलियांवाला बाग के गेट का वो सकरा
रास्ता पुलिस के सिपाहियों से भर चुका था। जनरल डायर ने बिना किसी चेतावनी के सिर्फ
एक शब्द "FIRE" कहा और जिंदगियाँ खामोश!

बताते हैं कि फायरिंग से बचने के
लिए औरतों ने बाग में बने कुएं में कूदकर अपनी जान दे दी। ये कुआँ आज भी इस
हत्याकांड की याद दिलाता हुआ बाग में मौजूद है जो अब ''शहीदी कुआँ'' के नाम जाता
है। दीवारों पर चढ़कर बाग से बचकर निकलने की कोशिश करते लोगों पर भी पुलिस ने
फायरिंग की। गोलियों के निशां बाग की दीवारों पर आज तक मौजूद हैं। जमीन पर हरी घास
खून से सनी थी, मिट्टी के कही नामो निशान नही था। जहाँ तक नज़र जाती बस लाशें ही
लाशें। बच्चे-बूढ़े-महिला-पुरुष सबकी लाशें थी। कही कोई बुजुर्ग दर्द में आहें भरता
तो कही कोई बच्चा जोर जोर से डरती आवाज में रो रहा था चिल्ला रहा था। जनरल डायर के आदेश पर करीब सौ सैनिकों ने
10 मिनट में 1650 राउंड फायर किए थे। सरकारी दस्तावजों में मौत का आंकड़ा
376 और घायलों का 1200 बताया गया। लेकिन असल में हजारों लोग मारे गए थे। जबकि
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुताबिक उस दिन 1000 से ज्यादा लोग मारे गए थे और
1,500 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। इस घटना के बाद अमृतसर में दो महीने तक
कर्फ्यू लगा रहा और मार्शल लॉ भी लागू कर दिया गया।
जलियांवाला बाग के इस क्रूर नरसंहार ने लोगों के
अंदर डर बैठा दिया था। इतना डर कि लोग अपने परिजनों का लाशों तक को लेने बाग में
वापस नही आये और प्रेस में अगले रोज इस घटना कोई रिपोर्टिंग नही हुई। केवल एक
अखबार "बॉम्बे क्रॉनिकल" ने इस भयानक नरसंहार की खबर लिखी और ब्रिटिश
सरकार की आलोचना करने का साहस उठाया।
रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस नरसंहार के विरोध में ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गयी "नाइट" की उपाधि
ये कह कर लौटा दी कि "वह समय आ गया है जब सम्मान के प्रतीक, अपमान अपने बेमेल
सन्दर्भ में हमारी शर्म को उजागर करते है और मैं, जहाँ तक मेरा सवाल है, सभी विशिष्ट
उपाधियों से रहित होकर अपने देशवासियों के साथ खड़ा होना चाहता हूँ।"

पूरी
दुनिया के दबाव के बाद जलियांवाला बाग हत्याकांड में शामिल आरोपियों की जाँच के लिए
हंटर आयोग बिठाया गया। आयोग की रिपोर्ट में जनरल डायर को दोषी क़रार दिया गया और उसे
बर्ख़ास्त करने की सिफ़ारिश की गयी। डायर को वापस ब्रिटेन भेज दिया गया। हाउस ऑफ कॉमन्स
ने डायर के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित किया, लेकिन हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने इस हत्याकांड
की तारीफ करते हुए जनरल डायर के लिए प्रशस्ति प्रस्ताव पारित किया। जिसे बाद में भारत
और दुनिया के दबाव में ब्रिटिश सकार ने उसका निंदा प्रस्ताव पारित करवाया। और अंततः
1920 में डायर को इस्तीफा देना पड़ा।
डायर ने हंटर जांच आयोग के बिना गोलीबारी के भीड़ को तितर-बितर करने की कोशिश
पर एक सवाल के जवाब में कहा- ‘‘मैं सोचता हूं कि बिना गोली बारी के ही भीड़ को तितर-बितर
करना संभव था, परन्तु भीड़ बार-बार वापस आ जाती थी और मुझ पर हँसने लगती थी तो मुझे
लगा कि वे लोग मुझे बेवकूफ समझ रहे हैं।"
जलियांवाला
बाग हत्याकांड में किसी तरह बच जाने वाले 12-13 साल के बच्चे सरदार उधम सिंह ने 21
साल बाद मार्च 1940 में पंजाब के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ’ ड्वायर की लंदन
में गोली मारकर हत्या कर अपने देशवासियों के खून का बदला लिया। ड्वॉयर ने जलियांवाला
बाग में जनरल डायर की कार्रवाई का समर्थन किया था। इस हत्या के लिए लंदन में जुलाई
1940 में उधम सिंह को फाँसी दे दी गयी। उधम सिंह के नाम से ही हमारे उत्तराखंड के एक
जिले का नाम उधम सिंह नगर रखा गया है।
एक
घटना जिसने आज़ादी के आंदोलन को और ज्यादा भड़का दिया था आज़ादी की आग को देश के गाँव-गाँव,
शहर-शहर, गली-गली पहुँचा दिया। जिसने ब्रिटिश सरकार के क्रूर चेहरे को पूरी दुनिया
के सामने बेनकाब किया।
अंततः
हम इतिहास से कितना सीखते है ये पूरी तरह हम पर ही निर्भर करता है।
(इस
लेख की सभी जानकारी बीबीसी, भारत में उपनिवेशवाद और राष्ट्रवाद, History of modern
India, India's struggle for Independence, राज्यसभा टीवी से ली गयी है)
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