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Showing posts from September, 2018

युद्ध समाधान नही हो सकता कभी भी नही!

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युद्ध समाधान नही हो सकता कभी भी नही! मेरी एक दोस्त है, ग्रेजुएशन के दिनों की। वो हम सब दोस्तों में सबसे खुशमिजाज लड़की थी। पेपर देने के बाद जहाँ हम सब टेंसन में रहते थे और वो, वो पेपर के बाद हर रोज़ हमें गोपेश्वर (चमोली, उत्तराखंड) के शंग्रीला होटल में छोले समोशे खाने ले जाती थी। जिंदगी से भरपूर। हमारे पास करिअर को लेकर तब एक या दो गोल थे उस के पास 8-10 होते थे। और उसने कैरियर ऑप्शन के लिए BSc PCM करने के साथ ही 12वीं बायोलॉजी से भी डाला था ताकि मेडिकल का ऑप्शन भी उसके पास हो जाय। इसी के चलते एक साल बाद वो देहरादून मेडिकल का कोई कोर्स करने चली गयी। और अगले दो साल में उसकी शादी भी हो गयी।  हमें उस वक्त लगा था ये जल्दी है पर वो खुश थी। शादी जल्दी करने  का कारण पूछा तो उसने कहा लड़का एयर फोर्स में है और बहुत अच्छा है तो कर ली। मेरी उस से मुलाकात नही हुई बहुत समय से, लेकिन फेसबुक पर उसकी सुंदर सुंदर फ़ोटो देख हम सब दोस्त खुश होते थे।      अब अभी 20 दिन पहले उसके पति के ऑन ड्यूटी मृत्यु की खबर एक दोस्त ने बताई।  जैसे ही दोस्त ने ये बात बताई मेरे सामने व...

उत्तराखंड में स्वास्थ्य का हाल

उत्तराखंड में स्वस्थ्य सुविधाओं की हालत किसी से छुपी नही है। पहाड़ हो या मैदान दोनों में उन्नीस-बीस का ही अंतर होगा। पहाड़ में महिलाएं पुल पर बच्चे को जन्म दे रही है तो राजधानी देहरादून में अस्पताल के फर्श पर। इधर दून अस्पताल में महिला बच्चे को फर्श पर जन्म दे कर मर रही थी तो कुछ ही दूरी पर विधानसभा में राज्य की विधानसभा का सत्र चल रहा था। जहाँ इन मरती माओं पर बात करने के लिए 1 मिनट का समय भी राज्य की 70 जिन्दा लाशों के पास नही था।         पहाड़ के कई चमचमाते अस्पतालों में ताले लगे है तो कई अस्पताल नर्स, फार्मासिस्टों की दया पर खुले रहते है। इन जगहों पर किसी मरीज का जुखाम-बुखार का इलाज भी हो जाय तो उसे चमत्कार ही माना जाना चाहिए। गंभीर बीमारी होने पर आपकी जान जानी निश्चित है वो आप पर निर्भर करता है कि आप पहाड़ के अस्पतालों में बिना डॉक्टरों के मरे या पहाड़ के रेफर सेंटरों से जान बचाते बचाते देहरादून के अस्पतालों के फर्श पर। मरना तो तय है पर कहाँ ये आपको तय करना है?         राज्य सरकारों ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में इतना...

उत्तराखंड में पर्यावरण की दशा एवं दिशा

सभी प्राकृतिक संसाधन जैसे भूमि, हवा, जल, वन एवं जन्तु मानव मात्र के पूर्ण विकास एवं अस्तित्व के लिये आवश्यक हैं. हमारे चारों ओर व्याप्त संसाधन ही पर्यावरण है. विकास इन संसाधनों का परिपूर्ण पद्धति द्वारा अनुकूलतम उपयोग है. आर्थिक वृद्धि एवं पर्यावरण संरक्षण दोनों में परस्पर अन्तरसम्बन्ध है, परन्तु वर्तमान एवं भविष्य की गुणात्मक एवं मात्रात्मक आधारभूत मानव आवश्यकताएँ, प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से संसाधनों के अनुकूलतम उपयोग, बिना पर्यावरण को क्षति पहुँचाए हुए पर निर्भर हैं. आज पूरी दुनिया की तरह उत्तराखंड में भी पर्यावरण और विकास के बीच एक तरह का युद्ध चल रहा है। वर्तमान विकासवादी दृष्टिकोण पर्यावरण की रक्षा के लिये गंभीर नहीं है, जबकि राष्ट्रीय पर्यावरण नीति 2006 के मूल बिंदुओं पर गौर करें तो प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर समाज की अनदेखी नहीं हो सकती है वन्य जीवों और इंसानों के बीच टकराहट बढ़ती जा रही है। शायद ही लोग जंगल के शेर से इतने भयभीत पहले कभी रहे हों जितना आज हो रहे हैं। इसका कारण है कि जहां जंगल थे वहां लोग चले गये और जहां लोग थे वहां जंगली जानवर घूमने लगे। पर्यावरण में ऐसा अ...

JNU और छात्रराजनीति

JNU में लेफ्ट यूनिटी ने चारों पदों पर जीत हासिल की है। ये जीत संघर्षों की जीत है। देश में बहुत सारे विश्वविद्यालय है जहाँ चुनाव हुए है तो फिर JNU के लिए पुरे देश में बहस क्यों हो रही है और मैं पोस्ट क्यों लिख रही हूँ? वो इस लिए कि JNU के  छात्रसंघ ने देश के छात्रों-नौजवानों, महिलाओं, किसानों, मजदूरों हर किसी के सवालों पर संघर्ष किया है।     इस देश में छात्रों को अगर Non-Net fellowship मिल रही है तो वो केवल इस लिए कि JNU के छात्रसंघ ने दिसम्बर की ठण्ड में UGC के बाहर 2 महीने तक दिन- रात  बैठ कर संघर्ष किया। निर्भया कांड के बाद देश में महिलाओं के लिए कठोर कानून और "बेखौफ आज़ादी" की माँग JNU से ही उठी थी और फिर उस आन्दोलन ने देश की गली मुहल्लों तक में विरोध की आवाज को पहुंचा दिया था। देशभर में LGBT समुदाय के लोगों के अधिकारों की माँग हो तो JNU सबसे आगे खड़ा होता है। इस देश में किसानों का विरोध हो या मजदूरों का  उन सब को JNU के ये छात्र आवाज देते है। देश की किसी समस्या पर बात रखनी हो या विदेश की यहाँ का छात्रसंघ हर गाँव, जिले, शहर और देश की आवाज़ को उठाता है। ...