उत्तराखंड का नाम आते ही पहाड़ और पहाड़ में पहाड़ जैसा जीवन जीने वाली महिलाओं की तस्वीर आती है। जो पहाड़ को सींचती-सवारती है। पहाड़ का हर कंकड़ पत्थर महिलाओं के संघर्ष की कहानी सुनाता है। वो जंगलों से घास भी लाती है तो खेती किसानी भी उसी के जिम्मे होती है। यही पहाड़ महिलाओं के लिए शांत और सुरक्षित माने जाते थे। उसमे से पहाड़ की शांत फिजायें तो और भी सुरक्षित मानी जाती थी। लेकिन छोटी बच्चियों और महिलाओं के साथ लगातार हो रही घटनाएँ और विभिन्न संस्थाओं के द्वारा दिए जा रहे आँकड़े पहाड़ की इन शांत वादियों की कुछ और ही तस्वीर सामने रख रहे है| इन अलग आती तस्वीरों में महिला सुरक्षा के नाम पर होने वाले तमाम कार्यक्रमों के खोखलेपन व केवल कागजों, भाषणों और नारों तक ही सीमित होने की तस्वीर भी साफ दिखती है| बीते दिसम्बर महीने में हुई दो अलग अलग घटनाओं में पहाड़ ने न केवल पहाड़ बल्कि पूरे देश को, महिलाओँ के लिए अपने असुरक्षित होने की खबर दी। 16 दिसम्बर को न केवल भारत बल्कि दुनियाभर को हिला देने वाले “निर्भयाकांड” के 6 साल पूरे होने के दिन ही पौड़ी की एक 18 वर्षीय छात्रा को एक शादीशुदा आदमी ने पेट्रोल छिड़क कर आग लगा दी। 16 दिसम्बर को महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे को लेकर देश भर में आंदोलन हुए। इस मामले ने महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों के लिए न केवल एक मजबूत कानून बनाया बल्कि छेडख़ानी से लेकर बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों को संसद से लेकर चूल्हे तक की बहस का विषय बनाया। इन दो 16 दिसम्बर के बीच के फासले में बहुत कुछ बदला। महिलाओं के साथ हो रहे अपराधों के सवाल ने सरकारों को तो गिराया लेकिन महिलाओं के खिलाफ हो रहे अपराध कम नही हुए बल्कि दिन-दूनी-रात-चौगुनी बढ़ोतरी के साथ छोटी बच्चियों से लेकर अधेड़ उम्र तक की महिलाओं को इन अपराधों ने अपने साये में लिया। महिलाओं के खिलाफ बढ़ रहे ये अपराध केवल आंकड़ों की शोभा नही बढा रहे बल्कि जमीन पर आंकड़ों से ज्यादा भयावह स्थिति है। पौड़ी में जिस छात्रा को पेट्रोल डाल कर जलाया गया था पौड़ी, ऋषिकेश एम्स ओर फिर दिल्ली के सफरदंज अस्पताल के डॉक्टरों के हर सम्भव प्रयास के बावजूद 80% से अधिक जल जाने के कारण 22 दिसम्बर को वो अंततः जिंदगी की जंग हार गई। पेट्रोल डालने का कारण लड़की का प्रेम में ‘न’ बोलना बताया गया। लड़की ने जिस आरोपी को न कहा था वो 32 साल का शादीशुदा और एक बच्चे का पिता भी है।
पौड़ी की दिलदहला देने वाली घटना के बाद दूसरी घटना चमोली जिले के कर्णप्रयाग शहर में 25 दिसम्बर की है। जहाँ शहर के पास ही शाम को अपने दोस्त के साथ घूमने गयी कर्णप्रयाग महाविद्यालय की छात्रा के साथ नगर पालिका में काम करने वाले 3 मजदूरों ने चाकू की नोक दिखा कर सामूहिक बलात्कार किया। पहले छात्रा के दोस्त को बुरी तरह से मारा गया और जान से मारने की धमकी देकर भगा दिया और फिर इस दर्दनाक घटना को अंजाम दिया गया। पहाड़ के इस क्षेत्र में सामूहिक बलात्कार की यह पहली घटना थी इस घटना ने जता दिया कि महिलाओं के लिए अब शांत पहाड़ सुरक्षित नही रहे। इस घटना में तीनों आरोपी राज्य से बाहर के थे। पीड़ित छात्रा की तहरीर पर पुलिस ने आरोपियों को तत्काल गिरफ्तार कर लिया था। घटना के बाद राज्य में लगभग सभी जगह विरोध प्रदर्शन हुए, आरोपियों को कठोर सजा के साथ फाँसी की भी माँग हुई। चूँकि सभी आरोपी बाहरी राज्यों के थे तो सरकार को अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ने में आसानी हो रही। बाहरी लोग भविष्य में इस तरह के अपराधों को अंजाम न दे इसलिए सरकार कार्यवाही के तौर पर बाहरी राज्यों से आये मजदूरों और अन्य छोटे कारोबारियों का पुलिस वेरिफिकेशन अनिवार्य कर दिया। लेकिन क्या पुलिस वैरिफिकेशन कर देने भर से इस तरह के अपराध रुक या कम हो जाएंगे? ऐसा सवाल इस लिए है कि केवल इसी घटना में तीन में से एक आरोपी का पुलिस वैरिफिकेशन हुआ था और वो तब भी अपराध में संलिप्त रहा। इसका अर्थ है कि समाधान करने के लिए सरकार को बहुत से स्तरों पर काम करने की आवश्यकता है।
आँकड़ों की जुबानी उत्तराखंड की कहानी
कर्णप्रयाग ओर पौड़ी की दर्दनाक घटना के अलावा भी राज्य में पिछला साल कई और वीभत्स घटनाओं का गवाह बना। शांत मिजाज का यह प्रदेश भी महिलाओं के लिए देश के अन्य हिस्सों की तरह ही असुरक्षित है। इस बात की पुष्टि सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं के द्वारा जारी किए जा रहे आँकड़े भी कर रहे है। राज्य में महिलाओं के साथ हत्या,बलात्कार, ऐसिड अटैक जैसे गम्भीर अपराधों की संख्या लगातार बढ़ रही है। पिछले तीन सालों 2016 में 9850, वर्ष 2017 में 11078, और 2018 में 11929 छोटे-बड़े मामले आये। इन आंकड़ों में पिछले तीन सालों में हत्या के 80, बलात्कार के 650 से ज्यादा मामले, और ऐसिड अटैक के 100 से अधिक मामले डरावनी सच्चाई बताने के लिए काफी है।
निर्भया कांड के बाद देश भर में शारीरिक और मानसिक रूप से पीड़ित महिलाओं की सुरक्षा और कानूनी मदद के लिए निर्भया सेल का गठन किया गया। उत्तराखंड में 16 अगस्त 2016 को इस सेल का गठन किया गया। जिसमें हजारों महिलाओं ने शिकायत दर्ज की और अपने साथ हुए अपराध के लिये न्याय की मांग की। केवल देहरादून से में ही 1312 मामले इस सेल में दर्ज है। अब बजट के अभाव में यह प्रकोष्ठ मदद माँगने आयी महिलाओं की मदद नही कर पा रहा है। इस से पता चलता है कि हमारी सरकारें महिला सुरक्षा के लिए कितनी चिंतित है?
महिलाओं की मदद के लिए उत्तराखंड पुलिस की हेल्पलाइन नम्बर 1090 सक्रिय है। इस हेल्पलाइन पर राज्य के कोने कोने से महिलाएं शिकायत करती है और मदद की गुहार लगाती है। पिछले वर्ष 2018 में ही इस हेल्पलाइन में पांच हज़ार से अधिक शिकायतें दर्ज हुई। इसमे छेड़छाड़, घरेलू हिंसा, दहेज प्रताड़ना से लेकर यौन शोषण के गंभीर मामले शामिल है। पिछले तीन सालों के आँकड़े बताते है कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए किए जा रहे सारे नारे और काम केवल कागजों की शोभा बढ़ा रहे है जब जमीन पर महिलाओं का सुरक्षित रहना अब एक “घटना” है न कि उनका असुरक्षित रहना।
महिला हेल्पलाइन नम्बर को पिछले तीन सालों में मिली शिकायते--
जनपद 2016 2017 2018
देहरादून 2465 2478 2440
हरिद्वार 533 476 648
नैनीताल 807 714 403
अल्मोड़ा 605 618 247
यूएसनगर 327 309 231
उत्तरकाशी 63 97 130
पौड़ी 150 146 128
पिथौरागढ़ 165 137 120
चंपावत 82 94 116
चमोली 97 122 114
बागेश्वर 46 50 66
टिहरी 138 130 56
रुद्रप्रयाग 51 42 45
आंकड़ों में महिलाओं की स्थिति भयावह है और जमीन पर इस से भी ज्यादा भयावह तस्वीर है। क्योंकि ऐसे अनगिनत मामले है जो हेल्पलाइन के फोन की घण्टी भी नही बनते और थाने की दहलीज भी नही लाँघ पाते। कुल मिला कर कहें तो हालात बहुत बुरे है। एक सभ्य समाज को अब हर एक घटना के बाद केवल ‘आरोपी को फाँसी दो-फाँसी दो’ और विरोध प्रदर्शन करने तक सीमित होने से बाहर निकलना होगा। महिलाओं को मार डालने ओर नोच डालने में न कानून का भय है न समाज का। तो इसका मतलब है कि समस्या की जड़ को खत्म करने के लिए समाज के अंदर ही झांकना होगा। वही समाज जो महिला के हँसने, बोलने , खेलने-कूदने, बाहर जाने, अंदर आने, घूमने, पढ़ने-लिखने, दोस्त-जीवनसाथी चुनने तक के लिए अपनी एक स्केल ले आता है। जिसमें महिला के साथ कुछ भी गलत होने पर उसी की इज़्ज़त जाती है आरोपी की नही। जहाँ लड़की के साथ छेड़खानी से लेकर माहिला के बलात्कार होने तक के लिए महिलाओं को ही जिम्मेदार घोषित कर दिया जाता है। परन्तु छेड़खानी, हत्या और यहाँ तक कि बलात्कार करने पर भी आरोपी की इज़्ज़त इंच भर भी कम नही होती। जहाँ लड़की की ‘न’ का कोई मोल नही है। समस्या की जड़ यही है। इसी पितृसत्ता के खिलाफ खड़े होने की जरूरत है। जिसमे महिलाओं को एक ‘सामान’ से ज्यादा कुछ नही समझा जाता है। टीवी पर पुदीन हारा के विज्ञापन से लेकर पुरुषों के रेजर तक के विज्ञापन में महिलाओं की उपस्थिति अनिवार्य कर दी गयी है। हमें उस अदृश्य नाक की इज़्ज़त से बाहर निकलने की जरूरत है जो महिला के अंग विशेष तक सीमित होती है। परिवार में लड़कों को संवेदनशील बनाने की जरूरत है ताकि वो केवल अपने परिवार की महिलाओं की नही बल्कि समाज की हर महिला का सम्मान करें।
समाज के अंदर बहुत खमियाँ है। लेकिन इस से पुलिस, प्रशासन और सरकार अपनी जिम्मेदारियों से बच नही सकते। इस तरह की घटनाएँ इसलिए हो रही है कि आरोपियों के मन से पुलिस और कानून का भय खत्म हो गया है। समाज और कानून दोनो को एक साथ काम करने की जरूरत है। ताकि इन मरती बच्चियों के साथ हमारी संवेदनाएं न मर जाये। ताकि बच्चियाँ, महिलाएं बची रहे और अंततः मानव समाज बचा रहे।
बाक्सः पिछले वर्ष घटी कुछ प्रमुख घटनाएं जिन्होंने शर्मसार किया
1- पौड़ी में सिरफिरे ने कालेज छात्रा पर पैट्रोल छिड़क कर आग लगाई, 80% जलने के बाद इलाज के दौरान छात्रा की मौत।
2- कर्णप्रायाग में छात्रा के साथ तीन युवकों ने सामूहिक दुष्कर्म किया।
3- उत्तरकाशी में नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार।
4- देहरादून के प्रसिद्ध जीआरडी स्कूल की छात्रा के साथ सामूहिक दुष्कर्म।
5- देहरादून स्थित राष्ट्रीय दृष्टिबाधित संस्थान (एनआईवीएच) में छात्राओं से छेड़-छाड़।
6- प्रतिष्ठित संस्थान आईआईटी रुड़की में तीन छात्राओं ने सात प्राध्यापकों पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया।
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