30 मई 2020-1
डायरी लिखना शुरू कर रही हूँ। इस लिए कि जब कोरोना और लॉक डाउन का ये समय गुजर जाएगा तो इसे शब्द-दर-शब्द याद रखूँ। चारों तरफ फैले जीवन और भविष्य के डर को और इस से उपजे अवसाद को याद रख सकूँ। शायद ये लिखने में देरी कर दी है लेकिन बाद में शायद इस देरी को समझ पाऊं।
तो आज कोरोना के कारण हुए लॉक डाउन ( 25 मार्च) को दो महीने से ज्यादा बीत गए है। अभी कोरोना के केस लगातार बढ़ रहे है इस लिए चौथा लॉक डाउन चल रहा है। हमारी यूनिवर्सिटी तो उस से भी पहले 16 मार्च को ही बन्द हो गयी थी। देश के अन्य विश्वविद्यालय भी होली (10 मार्च) की छुट्टियों के बाद ही बन्द हो गए थे।
जब लॉक डाउन शुरू हुआ तो लगा छुट्टियाँ पड़ गयी अब मज़े करेंगे। तब तक चूँकि देश मे केस ज्यादा नही थे तो डर भी नही था। लेकिन जैसे जैसे केस बढ़ते गए वैसे वैसे डर भी बढ़ने लगा।
आज जब मैं ये लिख रही हूँ तो पूरी दुनिया में कोरोना के संक्रमित केस 57,04,736 हो गए है और इस में पिछले एक दिन में ही 1,08,220 संक्रमित केस जुड़े है। मरने वालों का आँकड़ा पूरी दुनिया में 3,57,736 में हो गया है। भारत मे यही आँकड़ा बहुत तेजी से बढ़ रहा है। अब तक यहाँ संक्रमित लोग 1,65,799 हो गए है और मरने वालों का आँकड़ा 4,706 हो गया है। मेरे राज्य उत्तराखंड में भी आंकड़े तेजी से बढ़ रहे है। यहाँ कल एक दिन में सबसे ज्यादा 200 से ज्यादा संक्रमित केस आये और अब संक्रमित लोगों की कुल संख्या 716 केस हो गए है। संक्रमण ने इंसानों को केवल आंकड़ों में तब्दील कर दिया है जबकि इन संक्रमित हुए और मरने वालों की अलग अलग कहानियाँ होंगी और सबके अपने अपने संघर्ष होंगे। लेकिन अब ये बस गणित के अंकों में सिमट गई है। यही शायद इस समय का सबसे बड़ा सच है।
ये सब आँकड़े अब लगातार डर को बढ़ा रहे है और लॉक डाउन के बढ़ने की ओर भी संकेत कर रहे है। जब लॉक डाउन हुआ था तो तब केस 500 थे। और संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए लॉक डाउन किया गया। लेकिन अब केस लगातार बढ़ रहे है। जो बीमारी 3 हफ्ते पहले तक शहरों की बीमारी थी उसका अब संक्रमण गाँवों तक पहुँच गया है। क्योंकि शहरों के मजदूर अब रोजगार न होने के कारण घरों की तरफ लौट रहे है।
इस समय मे सबसे ज्यादा मजदूर परेशान रहे, दिहाड़ी मजदूर। उनके पास खाना तब आता है जब वो हर दिन काम करते है लेकिन इस समय मे सब कुछ बन्द है। उनके भूखे मरने और जिस दिन से लॉक डाउन चल रहा है तब से उनके सैकड़ों किलोमीटर पैदल अपने घरों को चलने की तश्वीरें मैं रोज अखबारों, सोशल मीडिया में देख रही हूँ। रोज एक अलग तश्वीर वायरल होती है और अगले ही दिन फिर दूसरी तश्वीर आ जाती है जिसे देख बस थम कर बैठ जाती हूँ, अगले दिन उस से भी बुरी और डरा देने वाली तश्वीर के इंतज़ार में।
ये दो महीने इसी में गुजर गए है।
हर दिन एक तश्वीर लगाऊँगी जिसने मुझे सबसे ज्यादा परेशान किया। जिसने रात को आंखों में नींद नही आने दी।
इस फोटो में जो महिला है वो गुजरात से श्रमिक स्पेशल ट्रेन से निकली थी और बिहार मुजफ्फरनगर पहुँचने तक मर गयी भूख और प्यास से। उसका बच्चा, जिसे मरने का मतलब भी नही पता वो अपनी माँ के कफ़न से खेल रहा है, उसे जगा रहा है।
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