युद्ध समाधान नही हो सकता कभी भी नही!

Image
युद्ध समाधान नही हो सकता कभी भी नही! मेरी एक दोस्त है, ग्रेजुएशन के दिनों की। वो हम सब दोस्तों में सबसे खुशमिजाज लड़की थी। पेपर देने के बाद जहाँ हम सब टेंसन में रहते थे और वो, वो पेपर के बाद हर रोज़ हमें गोपेश्वर (चमोली, उत्तराखंड) के शंग्रीला होटल में छोले समोशे खाने ले जाती थी। जिंदगी से भरपूर। हमारे पास करिअर को लेकर तब एक या दो गोल थे उस के पास 8-10 होते थे। और उसने कैरियर ऑप्शन के लिए BSc PCM करने के साथ ही 12वीं बायोलॉजी से भी डाला था ताकि मेडिकल का ऑप्शन भी उसके पास हो जाय। इसी के चलते एक साल बाद वो देहरादून मेडिकल का कोई कोर्स करने चली गयी। और अगले दो साल में उसकी शादी भी हो गयी।  हमें उस वक्त लगा था ये जल्दी है पर वो खुश थी। शादी जल्दी करने  का कारण पूछा तो उसने कहा लड़का एयर फोर्स में है और बहुत अच्छा है तो कर ली। मेरी उस से मुलाकात नही हुई बहुत समय से, लेकिन फेसबुक पर उसकी सुंदर सुंदर फ़ोटो देख हम सब दोस्त खुश होते थे।      अब अभी 20 दिन पहले उसके पति के ऑन ड्यूटी मृत्यु की खबर एक दोस्त ने बताई।  जैसे ही दोस्त ने ये बात बताई मेरे सामने व...

कोरोना के संकट में खराब नेटवर्क और कनेक्टिविटी न होने से ऑनलाइन पढ़ाई की हालत



हर्षित उतराखंड के गढ़वाल केन्द्रीय विश्वविद्यालय से बीएससी कर रहे है| कोरोना के कारण विश्वविद्यालय शुरुआत में 31 मार्च तक के लिए ही बंद हुआ| इस कारण इन कुछ दिनों की छुट्टियों के लिए चमोली जिले में स्थित अपने घर चले गये| कोरोना का संकट बढ़ा तो विश्वविद्यालय ने ऑनलाइन पढ़ाई शुरू कर दी| लेकिन हर्षित पढ़ नही पा रहा, क्योंकि गाँव में नेटवर्क ही नही आता| किसी दोस्त से विश्वविद्यालय में हुई ऑनलाइन पढ़ाई का हाल पूछने के लिए उसे एक किलोमीटर की चढ़ाई चढ़ कर बाजार आना पड़ता है तब कही जा कर वो जानकारी जुटा पाता है| और जब से ऑनलाइन पढ़ाई हुई है तब से हर शाम बाजार आ कर ये जानकारी जुटाने का काम उसकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया है| 

अभिषेक भी हर्षित के साथ ही पहाड़ के एक बड़े शहर श्रीनगर में पढ़ता है| कोरोना से विश्वविद्यालय बंद होने के कारण अभिषेख जोशीमठ (चमोली) ब्लाक स्थित अपने गाँव आ गया| उस से बात होनी भी मुश्किल है| न उसके पास एंड्राइड फोन है और न गाँव में बटन वाले सस्ते फोन पर भी बात करने लायक नेटवर्क आ पाता है|  किसी से कुछ पूछना हो तो वो गाँव के पास धार (पहाड़ में ऊँची जगह) में जा कर ही यह मुमकिन हो पाता है|
बकुल ऑनलाइन कक्षाओं का लाभ नही ले पा रही है| जबकि बकुल रुड़की जैसे बड़े शहर में रहती है| बकुल के शहर में नेटवर्क की स्पीड इतनी नही है कि उस से ऑनलाइन क्लासेज का लाभ उठाया जा सके|

ये तीन उदाहरण है जो उत्तराखंड समेत देश का हाल बताने के लिए काफी है| गांवों में कनेक्टिविटी नही है तो शहरों में स्पीड| कोरोना महामारी के इस समय में केंद्र सरकार, राज्य सरकार, यूजीसी और विश्वविद्यालयों ने ऑनलाइन पढ़ाई का हल्ला मचाया हुआ है, बिना यह देखे कि इस व्यवस्था के लिए संसाधन है या नही| बिना बेहतर कनेक्टिविटी के गाँव- देहात तो छोड़ दीजिये शहरों में भी ऑनलाइन पढ़ाई नही हो सकती| ऑनलाइन पढ़ाई बिना यह देखे शुरू कर दी है कि कितने छात्रों के पास स्मार्टफोन या लैपटॉप है या नहीं है| बिना यह देखे कि छात्र और शिक्षक इस नये माध्यम के लिए कितना तैयार है?
  संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) के अध्ययन में सामने आया है कि कोरोना महामारी का सबसे ज्यादा प्रभाव छात्रों पर पड़ा है| दुनिया के 191 देशों के करीब 157 करोड़ छात्र इस से प्रभावित हुए है| इन प्रभावित छात्रों में भारत के 32 करोड़ छात्र भी शामिल है|
  भारत में 25 मार्च के पहले दौर के राष्ट्रीय लॉकडाउन शुरू होने से पहले ही स्कूल, कॉलेज एहतियात के तौर पर बंद कर दिए गये थे| 21 दिनों की ये समयसीमा 14 अप्रैल को खत्म होनी थी. इस बीच केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ रमेश पोखरियाल निशंक ने कहा कि छात्रों और शिक्षकों की सुरक्षा सरकार के लिए सर्वोपरि है और उनका मंत्रालय यह सुनिश्चित करने के लिए तैयार है कि यदि स्कूल और कॉलेज को 14 अप्रैल के बाद भी बंद रखने की जरूरत पड़ी तो छात्रों को पढ़ाई-लिखाई का कोई नुकसान नहीं हो| महामारी का संकट बढ़ने लगा तो सरकारों ने ऑनलाइन पढ़ाई करने के निर्देश दिए|
  सरकारों के बिना तैयारी के इन कार्यवाहियों ने देश में एक नई तरह की असमानता को जन्म दे दिया है| इस ऑनलाइन पढ़ाई में गाँव के छात्र वंचित हो गये है और शहरों के भी वो छात्र वंचित हो गये है जिनके पास स्मार्टफोन, लेपटॉप या महंगे गैजेट नही है|
   उत्तराखंड के आंकडे भविष्य में पढ़ाई का माध्यम बताये जा रहे ऑनलाइन सिस्टम के स्याह पक्ष को उजागर करने के लिए बहुत है| उच्च शिक्षा विभाग द्वारा जारी की गयी रिपोर्ट के हवाले से हिंदुस्तान अख़बार में 30 अप्रैल को छपी खबर के आंकड़े बता रहे है कि शिक्षकों और प्रशासन के तमाम प्रयासों के बावजूद केवल 44 फीसदी छात्रों तक ही ऑनलाइन पढ़ाई पहुँच पाई है| इस रिपोर्ट के अनुसार चमोली में सर्वाधिक 61 फीसदी छात्र और चम्पावत में सबसे कम 28 फीसदी तक ऑनलाइन शिक्षा से तक जुड़ पाए है|
  गढ़वाल विश्वविद्यालय उत्तराखंड का एकमात्र केन्द्रीय विश्वविद्यालय है| उच्च शिक्षा के लिए श्रीनगर पहाड़ों का केंद्र है| कोरोना महामारी के कारण गढ़वाल  विश्वविद्यालय 16 मार्च से बंद है| छात्रों की पढ़ाई पर कोई असर न पड़े इसके लिए विश्वविद्यालय ने ऑनलाइन पढ़ाई शुरू की| लेकिन माह बीत जाने के बाद भी 30-40 फीसदी से ज्यादा बच्चों को विश्वविद्यालय ऑनलाइन पढ़ाई से नही जोड़ पाया है|
गढ़वाल विश्वविद्यालय में अंग्रेजी विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो० सुरेखा डंगवाल का कहना है कि “अंग्रेजी में स्नातक में द्वितीय, चतुर्थ व छठे सेमेस्टर में लगभग 800 छात्र-छात्राएँ है| वे और उनके साथ के अन्य शिक्षक व्हाट्सएप, मेल, ऑनलाइन क्लासेज (जूम, मीट आदि) सभी माध्यमों से अभी तक केवल 180 से 200 छात्रों तक ही जुड़ पाये है| हमारे विश्वविद्यालय में आर्थिक रूप से कमजोर तबके के छात्रों का प्रतिशत ज्यादा है जिसके कारण उनसे ऑनलाइन पढ़ाई के लिए सबसे जरूरी टूल स्मार्टफोन की उम्मीद करना ही बेमानी है| ऑनलाइन पढ़ाई, संकट के समय में एक अच्छा माध्यम हो सकता था लेकिन संसाधनों की कमी से छात्रों का एक बड़ा तबका इस से वंचित हो गया है|”
गढ़वाल विश्वविद्यालय में ही गणित विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो० आर०सी० डिमरी का कहना है कि इस सत्र में गणित में चलने वाले तीनों सेमेस्टर में गणित विषय में 1400 के करीब छात्र है| कोरोना के कारण ऑनलाइन पढ़ाई शुरू की लेकिन महिना बीत जाने के बाद भी केवल 20-30 फीसदी बच्चे ही जुड़ पाए है| इसका कारण प्रो० डिमरी बताते है कि ऑनलाइन पढ़ाई के लिए सबसे जरूरीचीज़ है, अच्छी स्पीड की नेट कनेक्टिविटी, जो कि शहरों में ही हो सकता है जबकि हमारे यहाँ ग्रामीण पृष्ठभूमि के छात्र अधिक पढ़ते है| विभिन्न व्हाट्सएप ग्रुप में हमसे अभी तक केवल 400 ही छात्र जुड़ पाए है| जबकि ज़ूम एप में तो 1400 में से केवल 100 ही जुड़ पा रहे है|
प्रो० डिमरी गढ़वाल विश्वविद्यालय में विज्ञान संकाय के संकायाध्यक्ष (डीन) भी है| जिसमे वे भौतिक और रसायन विज्ञान जैसे ज्यादा छात्र संख्या वाले विषयों को भी देखते है| लेकिन इन विषयों का हाल भी गणित से जुदा नही है| विज्ञान संकाय के डीन होने के नाते प्रो० डिमरी ऑनलाइन पढ़ाई के उस पक्ष पर भी ध्यान आकर्षित करते है जिस पर शायद किसी का ध्यान नही गया| नेट कनेक्टिविटी अच्छी न होने के कारण शिक्षक पीडीऍफ़ बना कर छात्रों को मेल और व्हाट्सएप से पढ़ाई के साधन उपलब्ध करवा रहे है लेकिन छात्रों को बिना क्लासरूम और प्रयोगशाला के कैसे समझ आएगा? यह केवल खानापूर्ति ही है|
प्रो० डंगवाल और प्रो० डिमरी इस ओर भी ध्यान देते है कि जहाँ छात्र सिमित रहते है वहाँ यह माध्यम लाभदायक भी हो रहा है| जैसे मास्टर कोर्सेज़ के ही 70-80 फीसदी छात्र लॉक डाउन के बाद भी पढ़ाई कर पा रहे है|

कोरोना के इस संकट में मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से ऑनलाइन एजुकेशन के लिए मुहैया कराए जाने वाले प्रमुख डिजिटल/ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म जैसे- दीक्षा, ई-पाठशाला, नेशनल रिपोसिटरी ऑफ ओपन एजुकेशनल रिसोर्सेस (NROER), स्वयं  की जानकारी भी दी गयी| सरकार ने छात्रों के लिए ये तमाम मुफ्त ऑनलाइन सुविधाएं दी हैं|
केंद्र सरकार के साख्यिकी मंत्रालय के अधीन आने वाले नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) के 2017-18 के सर्वे में यह तथ्य सामने आया कि भारत में केवल 24 फीसदी घरों में ही इंटरनेट की सुविधा है| ग्रामीण भारत की 66 फीसदी जनता में से केवल 15 फीसदी के घरों में ही इंटरनेट की सुविधा है और शहरी भारत में भी आँकड़ा 42 फीसदी घरों तक ही सीमित हो जाता है| और अगर आँकड़े ये है तब ऑनलाइन पढ़ाई कैसे इन छात्रों तक पहुँचेगी?
जेंडर गैप
इंटरनेट का प्रयोग करने में असमानता केवल गाँव और शहर या अमीर गरीब के बीच नही है बल्कि इसमें अन्य क्षेत्रों की तरह ही इंटरनेट के इस्तेमाल में भी लैंगिक असमानता साफ़ दिखती है| भारतीय इंटरनेट और मोबाइल समूह के 2019 की रिपोर्ट कहती है कि भारत में 67 फीसदी पुरुषों की तुलना में केवल 33 फीसदी महिलायें ही इन्टरनेट का प्रयोग करती है| और ग्रामीण भारत में यह असमानता 72 फीसदी पुरुषों की तुलना में केवल 28 फीसदी रह जाता है| अगर आँकड़े ये है तो फिर गाँवों के देश में हम ऑनलाइन शिक्षा को कैसे सभी छात्रों और उन लडकियों तक पहुँचा पायेंगे, जिनके हिस्से खेती-बाड़ी और घर के तमाम कामों को करने के बाद अंत में पढ़ाई आती है?
इस सिस्टम ने केवल छात्रों की ही परेशानी नही बढाई बल्कि शिक्षकों को भी कई तरह की समस्याओं से हर दिन जूझना पड़ रहा है| शिक्षक भी ऑनलाइन माध्यमों से पढ़ाने में खुद को सहज महसूस नही कर रहे है|
अचानक आये इस संकट ने भविष्य माने जा रहे ऑनलाइन एजुकेशन की समस्याओं को सामने ला दिया है| सरकारों और संस्थाओं ने इन सब समस्याओं  को नही देखा, जिसका भुगतान वो छात्र कर रहे है जिनके परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नही है इस लिए उनके पास एक अदद स्मार्ट फोन नही है लैपटॉप तो दूर की बात है, वो छात्र कर रहे है जो संकट के इस समय में गांवों में है, वो छात्र करेंगे जिनके पास सब संसाधन तो है लेकिन इतनी स्पीड नही है कि ऑनलाइन से जुड़ पायें|
अगर भविष्य में ऑनलाइन पढ़ाई को शिक्षा का माध्यम बनाते है तो कोरोना महामारी ने उसमे आने वाली कठिनाइयों को सामने लाने का काम किया है| सरकारों को इस महामारी को अवसरों में बदलने की जरूरत है| जिसके लिए देश के हर गाँव, शहर, कस्बे को अच्छी स्पीड के इंटरनेट कनेक्टिविटी से जोड़ने की तरफ कदम बढ़ाना होगा और आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण छात्र शिक्षा से वंचित न हो जाय इसके लिए फ्री डाटा देने की तरफ भी काम करना होगा| वरना विषम परिस्थिति में अवसर बन कर सामने आया ऑनलाइन माध्यम एक नई गैरबराबरी को ही जन्म देगा|

ये आर्टिकल दो जगह छप चूका है-


Comments

Popular posts from this blog

युद्ध समाधान नही हो सकता कभी भी नही!

कोरोना वायरस और भारत का असंवेदनशील मिडिल क्लास

कोरोना और भविष्य का डर