महिला सशक्तिकरण के पुरोधा : बाबासाहेब डॉ0 भीमराव अम्बेडकर
बाबासाहेब डा0 भीमराव अम्बेडकर सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक दृष्टि से दलितों के प्रति समर्पित नेता थे। आजादी के पूर्व एवं पश्चात् वह धर्म के सुधारवादी- आलोचक और राजनीति में एक निश्चित दृष्टिकोण अपनाने वाले व्यक्ति थे। संविधान के महान निर्माता, गम्भीर विद्वान, और जिज्ञासु भी थे। इन सबसे अधिक वह अनेक स्तरों पर मानव मुक्ति के लिए एक सशक्त योद्धा थे। वैसे वह मामूली परिवार में जन्मे थे, पर विधि निर्माण के क्षेत्र में वह सर्वाधिक लोकप्रिय व्यक्ति बन गये। संविधान और विधिक क्रांति को समझने वाले लोग, उन्हें सामाजिक न्याय का मसीहा और सामाजिक दासता का कट्टर शत्रु के रूप में स्मरण करते है।
भारतीय इतिहास में अम्बेडकर ही एकमात्र पहले ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने इस देश की स्त्रियों की वस्तुगत स्थिति और उनके शोषण के आधारों को इस तरह से समझा जिस तरह से किसी ने नहीं समझा था। यह भारतीय समाज के उनके गहन अध्ययन और उनकी पैनी नज़र का ही नतीजा था कि उन्होंने स्त्री समस्या और स्त्री-पुरुष संबंधों कीअसमानता के मूल कारण को खोज निकाला। उन्होंने माना कि इस देश की स्त्रियों की समस्या का मूल कारण है-ज्ञान और संपत्ति पर स्त्रियों का कोई अधिकार न होना। मनुस्मृति के दौर से ही भारतीय स्त्री को ज्ञान और संपत्ति के अधिकार से वंचित करके एक बेगार गुलाम की स्थिति में पहुंचा दिया जाता था। उन्होंने लगातार स्त्री शिक्षा की वकालत की और उसके शिक्षित होने को देश के आर्थिक विकास के लिए महत्त्वपूर्ण माना।
भारत वर्ष में अस्पृश्यों के पश्चात् बाबा साहब अम्बेडकर हिन्दू नारी को ही सर्वाधिक उपेक्षित, अपमानित व प्रताड़ित जन समझते थे। जिस प्रकार अस्पृश्यों और शूद्रों के लिए कर्तव्यों की कोई कमी नहीं थी और अधिकारों का नाम निशान नही था, उसी प्रकार हिन्दू नारी भी स्मृतिकारों और शास्त्रों के पुरुष समर्थक रचियेताओं की एक पक्षीय दृष्टि की शिकार हुई थी। दायित्वों के बोझ तले उसका समस्त जीवन ख़त्म हो जाता था परन्तु दायित्वों की पूर्ति नहीं ही पाती थी। इसलिए हिन्दू कोड बिल के आधार पर वह न केवल भारतीय नारी पर सदियों से चले आ रहे पुरुष एकाधिकार को समाप्त करना चाहते थे, अपितु हिन्दू नारी को एक स्वतंत्र अस्तित्व प्रदान करना चाहते थे।
शोधार्थी के रूप में डा0 अंबेडकर हिन्दू व इस्लाम धर्म के साथ-साथ अन्य धर्मो का भी गहन अध्ययन किया। शायद यही वजह है कि वे धर्म व जाति की कैद से स्त्रियों की मुक्ति के हिमायती बने रहे। हिन्दू धर्मशास्त्रों में महिलाओं का स्थान और नियम-कानून महिलाओं के हक में नहीं हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार स्त्री धन , विद्या और शक्ति की देवी हैं। मनु स्मृति के तीसरे अध्याय के छप्पनवें श्लोक में जहां लिखा है:-
"यत्र नार्यस्तु पूज्यते, रमन्ते तत्र देवता !"
अर्थात जहाँ नारी की पूजा होती है वहां देवता रमण(निवास) करते हैं।’’
वहीं दूसरी ओर पांचवे अध्याय के 155 वें श्लोक में लिखा है:- ‘‘स्त्री का न तो अलग यज्ञ होता है न व्रत होता है , न उपवास। ऋग्वेद में "पुत्री के जन्म को दुःख का खान और पुत्र को आकाश का ज्योति माना गया है।" ऋग्वेद में ही नारी का मनोरंजनकारी भोग्या के रूप में वर्णन किया गया है तथा नियोग प्रथा को पवित्र कर्म माना गया है।
अथर्ववेद में कहा गया है कि "दुनियां की सब महिलाएं शूद्र है।" अर्थात महिलाएं निकृष्ट है। मैत्रेयणी संहिता में कहा गया हा कि नारी अशुभ है। तो व्ही शतपथ ब्राह्मण(3/2/4/6) में कहा गया है कि यज्ञ करते हुए किसी कुत्ते, शुद्र व नारी की तरफ मत देखो।
कन्या अभिशाप है (ऐतरेय ब्राह्मण 6/3/7/13)। इसलिये गर्भवती स्त्री के लिए एक करुणापूर्ण अनुष्ठान है- 'पुंसवन'। इसमे मनौती की जाती है कि गर्भ की सन्तान पुत्र ही हो।
ऐतरेय ब्राह्मण उसी नारी को उत्तम समझता है जो पति को संतुष्ट करती है, पुत्र सन्तान को जन्म देती है एवं पति से बढ़-चढ़कर कभी कुछ नही कहती (3/24/27)। सर्वगुण सम्पन्न श्रेष्ठ नारी भी अधम पुरुष से हीन है ( तैत्तिरीय संहिता 6/5/8/2)। लेकिन नारी उत्तम है या अधम, यह पुरुष की संतुष्टि पर निर्भर करता है।
इस्लाम में भी महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। कुरानशरीफ के आयत ( 1-4-11 ) में संपति से संदर्भित मामले में स्पष्ट लिखा है कि ‘‘ एक मर्द के हिस्से के बराबर है दो औरतों का हिस्सा।" तिरमीजी हदीस में कहा गया है कि " जो स्त्री बेशर्मीभरा काम करती है उसे बिस्तर से त्याग दो और ऐसी स्त्री को सामान्य तौर पर कुछ पिटाई भी करो।" तिरमीजी हदीस शरीफ में ही फिर लिखा है- "स्त्री- जाति एक 'गोपनीय वस्तु' है जब वह पर्दे के बाहर आती है तो शैतान उसे पुरुष की नजरों में मनोमुग्धकारी रूप में दिखाता है।" 'सूरा आहजाबे' में लिखा है- "हे स्त्रियों, तुम लोग अपने घरो में रहों और सज- संवर कर, घर से बाहर निकलकर अपना हुस्न और पहनावा गैर मर्द के सामने प्रदर्शित मत करो।"
धर्मशास्त्रों के सम्पूर्ण अध्यन के बाद हम देखते है कि औरतों की स्थति कुछ इस प्रकार की है- औरत अबला है, औरत शक्ति है, औरत भोग्या है, औरत सुंदर है और औरत विषकन्या है, औरत ही स्वार्थ है और औरत ही त्याग, औरत सृष्टि भी है और सर्वनाश भी, औरत को कभी कृष्ण तो कभी श्वेत रंग दे दिया जाता है, जब जहां जैसी जरूरत हो। सैकड़ों रूपों में अपने को ढालते- ढालते, विभिन्न रंगों में रंगते- रंगते औरत कहीं अपने को ही खो देती है। और अन्तत: उसका अस्तित्व खत्म हो जाता है, उसका व्यक्तित्व टूट जाता है। अंत में वह एक मांस के लोथड़े में तब्दील हो जाती है जो साँस तो लेती है पर अपनी व्यथा बोल नही सकती।
धार्मिक आस्था और महिलाओं को कमजोर बनाकर रखने का ही परिणाम था कि 8 मार्च 1535 को चित्तौड़गढ़ की रानी कर्णवती सहित अन्य नारियों को जौहर की चिता में प्राणों की आहुति देनी पडी । मध्यकाल की नायिका मीराबाई ने जब महल से बाहर कदम निकाली तो उसे जहर देकर मार डाला गया। मैत्रेयी औरगार्गी जब साध्वी बनीं तो साधुओं ने सवाल उठाया कि स्त्री साधु कैसे बन सकती है? इतिहास में मौजूद विरोधाभासों के कारण ही 1936 में लिखे आलेख के माध्यम से डा. अम्बेडकर ने सबसे पहले सवाल उठाया कि चातुर्यवर्ण व्यवस्था में महिलाओं को किस वर्ण में रखा जाएगा? क्योकि इस रुढ़िवादी समाज को स्त्री-पुरूष समानता से परहेज है। अत: इन विरोधाभासों को देखकर ही बाबा साहेब धर्म को महिलाओं की प्रगति और मुक्ति में सबसे बड़ा बाधक मानते थे।
महिलाओं के विकास में डॉ0 अम्बेडकर का एक महत्वपूर्ण सहयोग हिन्दू कोड बिल के रूप में था जो उन्होंने भारत के विधि मंत्री रहते हुए इस बिल का प्रारूप तैयार किया, उनका मानना था कि जब तक महिलाओं को पुराने हिन्दू कानूनों, मनु द्वारा निर्मित पुराने सामाजिक कानून, से आजादी नही मिलेगी, तब तक वे विकास नही कर पायेंगी।
भारत मे महिलाओं कि बहुत दयनीय स्थिति थी। धर्मशास्त्र महिलाओ को किसी भी तरह की आज़ादी नहीं देते थे। इसलिए डॉ0 बाबासाहेब अम्बेडकर ने महिला सशक्तिकरण के लिए कई कदम उठाए। संविधान सम्मत सामाजिक न्याय के सूत्र और हिन्दू कोड बिल में ही ‘‘महिला-सशक्तिकरण’’ की विशाल व्याख्या विद्यमान है। डा0 अंबेडकर का मानना था कि सही मायने में प्रजातंत्र तब आयेगा जब महिलाओं को पैतृक संपत्ति में बराबरी का हिस्सा मिलेगा और उन्हें पुरूषों के समान अधिकार दिए जाएंगे। डा0 अंबेडकर का दृढ. विश्वास था कि महिलाओं की उन्नति तभी संभव होगी जब उन्हें घर परिवार और समाज में सामाजिक बराबरी का दर्जा मिलेगा। शिक्षा और आर्थिक उन्नति ही उन्हें सामाजिक बराबरी दिलाने में मदद करेगी।
डा0 अम्बेडक ने जैसे ही हिन्दू कोड बिल को संसद में पेश किया। संसद के अंदर और बाहर विद्रोह मच गया। सनातनी धर्मावलम्बी से लेकर आर्य समाजी तक अंबेडकर के विरोधी हो गए। संसद के अंदर भी काफी विरोध हुआ। अंबेडकर हिन्दू कोड बिल पारित करवाने को लेकर काफी चिंतित थे। वहीं सदन में इस बिल को सदस्यों का समर्थन नहीं मिल पा रहा था। वह अक्सर कहा करते थे कि:- ‘‘मुझे भारतीय संविधान के निर्माण से अधिक दिलचस्पी और खुशी हिन्दू कोड बिल पास कराने में है।’’ सच तो यह है कि हिन्दू कोड बिल के जैसा महिला हितों की रक्षा करने वाला विधान बनाना भारतीय कानून के इतिहास की महत्वपूर्ण घटना है।
इसाई और मुस्लिम समुदाय की तरह हिन्दू समाज के लिए भी कोई पर्सनल लॉ नहीं था। भारतीय हिन्दू समाज में विवाह, उतराधिकार, दत्तक, निर्भरता या गुजारा भत्ता आदि का नियम-कानून एक समान नहीं था। इसाई तथा पारसियों में एक समय में एक स्त्री से शादी का प्रावधान था। वहीं मुस्लिम समुदाय में चार शादियों को मान्यता प्राप्तहै। लेकिन हिन्दू समाज में कोई पुरूष 100 शादियां भी कर ले कोई बंदिश नहीं थी। विधवा का मृत पति की संपत्ति पर हक नहीं था। सवर्ण समाज में विधवा-विवाह की परंपरा भी नहीं थी। 'अनुलोम विवाह', 'सम्बन्धम विवाह' जैसी स्त्री-शोषक परंपरा का दबदबा था।
सदियों से महिलाओं के साथ हो रही अमानुषिक व्यवहार को समूल नष्ट करने के लिए 11 अप्रैल 1947 को लोकसभा में हिन्दू कोड बिल पेश किया। इस बिल के अंततर्गत हिन्दू विवाह अधिनियम, विशेष विवाह अधिनियम, गोद लेना (दत्तक ग्रहण) अधिनियम, हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, निर्बल तथा साधनहीन पारिवारिक सदस्यों का भरण पोषण, उतराधिकारी अधिनियम, हिन्दू विधवा को पुनर्विवाह अधिनियम आदि कानून बनाये। इससे शादी-विवाह में ऊँच-नीच व जातीय भेद-भाव को खत्म कर दिया गया। एक पत्नी के रहते दूसरी शादी पर रोक लगा दिया गया और दंड का प्रावधान किया गया। पत्नी को तलाक देने के बाद दूसरी शादी करने की इजाजत दी गई। पति-पत्नी को तालाक देने का समान अधिकार दिया गया। तलाक के लिए आठ शर्तो को रखा गया। पति की मृत्यु के पश्चात् उसके संतान के बराबर अधिकार दिया गया। पिता के मृत्यु के पश्चात पुत्री को भी भाईयों के बराबर जायदाद का वारिस बनाया। हिन्दू परिवार में जन्मे बच्चा-बच्ची को गोद लेने का प्रावधान किया गया। गोद लेने वाले की संपति में भी अधिकार का प्रावधान किया।
हिंदू कोड बिल में स्त्रियों को तलाक का अधिकार देकर आंबेडकर एक ओर विवाह की अविच्छेद्यता को चुनौती देते है तो दूसरी ओर स्त्री को पुरुष के हर अन्याय को सहन करने की बाध्यता से छुटकारा दिलाते हैं। पुरुष के एक विवाहित पत्नी के रहते दूसरा विवाह करने की छूट पर प्रतिबंध लगा कर उसकी मनमानी पर अंकुश लगाते और पत्नी की स्वाधीनता और आत्मसम्मान को संरक्षित करते हैं। इसी तरह स्त्री को पुरुष की संपत्ति का उत्तराधिकार दिला कर वे उसकी आर्थिक परनिर्भरता को खत्म कर देना चाहते हैं। बिल के ये तीनों प्रावधान निश्चय ही स्त्री-पुरुष को समान धरातल पर खड़ा कर परिवार के आधार को अधिक मजबूत और पुख्ता करने और सामाजिक समरसता को बढ़ाने वाले हैं।
भारत के इतिहास में पहली बार इस विधेयक ने स्त्रियों को यह अधिकार दिया कि अनचाहे गर्भ से मुक्ति उनका अपना निर्णय होगा और अपनी देह और कोख पर उनका अधिकार।
कानून शास्त्र के नजरिये से रामायण का विश्लेषण करते हुए बाबा साहेब ने कहा था कि ‘‘ अगर राम और सीता का मामला मेरे कोर्ट में होता तो मैं राम को आजीवन कारावास की सजा देता।’’ संसद में हिन्दू कोड पर बोलते हुए डा0 आम्बेडकर ने कहा था कि ‘‘ भारतीय स्त्रियों की अवनति के कारण बुद्ध नहीं मनु है।’’
बाबासाहब ने संविधान मे महिलाओं को सारे अधिकार दिये लेकिन अकेला संविधान या कानून लोगों की मानसिकता को नहीं बदल सकता, पर सच है कि यह परिवर्तन की राह तो सुगम बनाता ही है। दरअसल, हिंदू कोड बिल पास कराने के पीछे अंबेडकर की हार्दिक इच्छा कुछ ऐसे बुनियादी सिद्धांत स्थापित करने की थी, जिनका उल्लंघन दंडनीय अपराध बन जाए। मसलन, स्त्रियों के लिए विवाह विच्छेद (तलाक) का अधिकार, हिंदू कानून के अनुसार विवाहित व्यक्ति के लिए एकाधिक पत्नी रखने पर प्रतिबंध और विधवाओं तथा अविवाहित कन्याओं को बिना शर्त पिता या पति की संपत्ति का उत्तराधिकारी बनने का हक।
बाबा साहब का दृढ़ मत था कि स्त्रियाँ जातिवाद का प्रवेश द्वार हैं। इसीलिए ब्राह्मणवाद उन पर कब्जा जमाए रखने के लिए जी-जान से लगा रहा है। वह जानता है कि उन्हें अधीन बनाए रख कर ही ऊंच-नीच पर आधारित जाति-व्यवस्था कायम रह सकती है। इस तरह हिंदू कोड बिल महिलाओं को पारंपरिक बंधनों से मुक्ति दिलाने की ओर उठाया गया एक ऐसा कदम था जो अंत में हिंदू समाज को जाति और लिंग के कारण पैदा हुई असमानता से मुक्त करा सकता था।
निष्कर्ष -- निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि डॉ0 भीम राव अम्बेडकर ने महिलाओं के उत्थान के लिए पारम्परिक रुढ़िवादी भारतीय समाज में हिन्दू कोड बिल को संसद में प्रस्तुत कराया जो यह स्पष्ट करता है कि वे महिला अधिकारों के कितने बड़े समर्थक थे, वे निरंतर महिलाओं के विकास में सहायक बने रहे। उन्ही के प्रयासों के कारण हमारा संविधान लिंग समानता का पर्याय बना हुआ है। और आज महिलायें, पुरुषों के कंधे से कंधा मिला कर अनेक क्षेत्रों में उनके समान कार्य कर रही है, और कहीं-कहीं तो उनसे आगे बढ़ कर भी।
शिवानी पाण्डेय
हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय,
श्रीनगर गढ़वाल, उत्तराखंड
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