युद्ध समाधान नही हो सकता कभी भी नही!

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युद्ध समाधान नही हो सकता कभी भी नही! मेरी एक दोस्त है, ग्रेजुएशन के दिनों की। वो हम सब दोस्तों में सबसे खुशमिजाज लड़की थी। पेपर देने के बाद जहाँ हम सब टेंसन में रहते थे और वो, वो पेपर के बाद हर रोज़ हमें गोपेश्वर (चमोली, उत्तराखंड) के शंग्रीला होटल में छोले समोशे खाने ले जाती थी। जिंदगी से भरपूर। हमारे पास करिअर को लेकर तब एक या दो गोल थे उस के पास 8-10 होते थे। और उसने कैरियर ऑप्शन के लिए BSc PCM करने के साथ ही 12वीं बायोलॉजी से भी डाला था ताकि मेडिकल का ऑप्शन भी उसके पास हो जाय। इसी के चलते एक साल बाद वो देहरादून मेडिकल का कोई कोर्स करने चली गयी। और अगले दो साल में उसकी शादी भी हो गयी।  हमें उस वक्त लगा था ये जल्दी है पर वो खुश थी। शादी जल्दी करने  का कारण पूछा तो उसने कहा लड़का एयर फोर्स में है और बहुत अच्छा है तो कर ली। मेरी उस से मुलाकात नही हुई बहुत समय से, लेकिन फेसबुक पर उसकी सुंदर सुंदर फ़ोटो देख हम सब दोस्त खुश होते थे।      अब अभी 20 दिन पहले उसके पति के ऑन ड्यूटी मृत्यु की खबर एक दोस्त ने बताई।  जैसे ही दोस्त ने ये बात बताई मेरे सामने व...

उत्तराखंड में पर्यावरण की दशा एवं दिशा

सभी प्राकृतिक संसाधन जैसे भूमि, हवा, जल, वन एवं जन्तु मानव मात्र के पूर्ण विकास एवं अस्तित्व के लिये आवश्यक हैं. हमारे चारों ओर व्याप्त संसाधन ही पर्यावरण है. विकास इन संसाधनों का परिपूर्ण पद्धति द्वारा अनुकूलतम उपयोग है. आर्थिक वृद्धि एवं पर्यावरण संरक्षण दोनों में परस्पर अन्तरसम्बन्ध है, परन्तु वर्तमान एवं भविष्य की गुणात्मक एवं मात्रात्मक आधारभूत मानव आवश्यकताएँ, प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से संसाधनों के अनुकूलतम उपयोग, बिना पर्यावरण को क्षति पहुँचाए हुए पर निर्भर हैं.
आज पूरी दुनिया की तरह उत्तराखंड में भी पर्यावरण और विकास के बीच एक तरह का युद्ध चल रहा है। वर्तमान विकासवादी दृष्टिकोण पर्यावरण की रक्षा के लिये गंभीर नहीं है, जबकि राष्ट्रीय पर्यावरण नीति 2006 के मूल बिंदुओं पर गौर करें तो प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर समाज की अनदेखी नहीं हो सकती है वन्य जीवों और इंसानों के बीच टकराहट बढ़ती जा रही है। शायद ही लोग जंगल के शेर से इतने भयभीत पहले कभी रहे हों जितना आज हो रहे हैं। इसका कारण है कि जहां जंगल थे वहां लोग चले गये और जहां लोग थे वहां जंगली जानवर घूमने लगे। पर्यावरण में ऐसा असंतुलन गलत नीतियों के कारण हुआ है.
पारिस्थितिकीय परिवर्तनों ने भी उत्तराखंड को एक स्तब्ध स्थिति में पहुंचा दिया है. बेशक अभी भी पहाड़ों में लोग स्वच्छ हवा पा लेते हैं लेकिन ऐसे इलाके सिकुड़ रहे हैं. अब तो पहाड़ों में भी स्वच्छ वायु, निर्मल जल और खामोशी की अनुगूंज वाली बात बेमानी लगती है. पर्यटन स्थलों पर भी निर्माण, वाहनों, प्लास्टिक और बसाहटों का बोझ बढ़ गया. विश्वग्राम और विकास के नाम पर फैलाई गई गंदगी का प्रभाव अब स्थानीय नहीं बल्कि ग्लोबल हो गया है.
अंग्रेजों ने अपने दौर में मसूरी, नैनीताल जैसे पहाड़ी स्थलों और देहरादून जैसी शिवालिक और मध्य हिमालय से घिरी घाटी में एक स्वप्निल पर्यावरण को देखते हुए बसाये थे, लेकिन आज के दिन पर ये शहर स्वच्छ और सुंदरता की अपनी पहचान खो चुके है. अब इन शहरों की पहचान गंदगी,  लगातार बढ़ती आबादी के साथ सर्वाधिक प्रदूषित शहरों के रूप में की जाने लगी है। अपने मौसम के लिए विख्यात दून घाटी अब धूल और धुएं और शोर की घाटी है. तो वही गंदगी के ढ़ेर में तब्दील हो चुके देहरादून को कागजों में स्मार्ट सिटी बनाने के लिए सरकारें दिन रात एक किये है.
आज से दो साल पहले नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल, एनजीटी, उत्तराखंड सरकार और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को औद्योगिक इकाइयों से उठने वाले प्रदूषण के खतरनाक स्तरों को लेकर फटकार भी लगा चुका है. इस प्रदूषण से निदान के लिए विशेषज्ञ और निगरानी समितियां बनाने का सुझाव भी दे चुका है, लेकिन निवेश, मुनाफा और जीडीपी का आकर्षण भी अब कुदरत में घुले प्रदूषण के समांतर एक मानव निर्मित प्रदूषण की तरह हो गया है. जंगलों की कटान और पहाड़ी इलाकों में पर्यावरणीय नियमों को ताक पर रख कर अंधाधुंध निर्माण ने हवा, पानी और मिट्टी के रास्ते उलटपुलट कर रख दिए हैं. इसका परिणाम ये हो रहा है कि अप्रत्याशित रूप से भूस्खलन और अतिवृष्टि की दरें बढ़ी हैं. बाढ़ से तबाही का दायरा फैलता जा रहा है इनसे पर्यावरणीय नुकसान के साथ साथ आर्थिक और सामाजिक नुकसान भी बढ़े है. केदारनाथ में जून 2013 की आपदा इसी अवैज्ञानिक और अंधाधुन विकास का परिणाम है. इस बीच पिछले कुछ सालों में पहाड़ों में जंगल की आग एक नया पर्यावरणीय संकट बन कर उभरा है जो किसी स्मॉग से कम नहीं है. डायनमाइट के विस्फोट से पहाड़ी संवेदनशील नोकों को उखाड़कर तैयार की गई सड़कों पर बारिश के दिनों में भूस्खलन की दरें बढ़ गई हैं. मिट्टी जगह छोड़ रही है, क्योंकि जंगल कट रहे हैं और सड़कें बन रही हैं. इसी का परिणाम है कि उत्तराखंड में बरसात के मौसम में आधी से ज्यादा सड़के बंद रहती है.

उत्तराखंड में वनों की अवैध कटाई ने पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचाया है। हाल ही में जारी की गयी "भारत वन स्थिति रिपोर्ट 2017"(India State of Forest Report- ISFR) में कहा गया है कि देश ही नही दुनिया को स्वच्छ पर्यावरण उपलब्ध करवाने वाले उत्तराखंड के पास वन लगाने के लिए कोई जमीन नही बची है. हालात ये है कि पंचेश्वर बांध  की सीमा में आने वाले वनों की प्रतिपूर्ति के लिए उत्तराखंड को अन्य राज्यों में वृक्षारोपण हेतु जमीन तलाशनी पड़ रही हैं. इस तलाश में उत्तर प्रदेश से लेकर कर्नाटक तक में सम्पर्क किये जा रहे है. चार धाम को वर्षों से हो रही लगातार अवैध कटाई ने जहां मानवीय जीवन को प्रभावित  किया है, वहीं असंतुलित मौसम को भी जन्म दिया है. गर्मियों में अत्यधिक गर्मी, बरसात में समय पर बारिश न होना इसी असंतुलित विकास का परिणाम है. विकास कार्यों, आवासीय जरूरतों, उद्योगों तथा खनिज दोहन के लिए भी, पेड़ें-वनों की कटाई वर्षों से होती आई है.
   दुनियाभर में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने को लेकर चिंताएं जताई जा रही हैं. हालांकि इस बारे में विद्वानों और विशेषज्ञों में मतभेद भी हैं. कुछ कहते हैं कि ये कोई असाधारण बात नहीं है और प्रकृति के सैकड़ों हजारों साल के बदलावों में ग्लेशियरों का बनना बिगड़ना स्वाभाविक है. लेकिन इधर पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों की एक बिरादरी पुरजोर तौर पर मानती है कि ग्लेशियरों का पिघलना एक सामान्य घटना नहीं है और ये जलवायु परिवर्तन के सबसे बड़े सूचकों में से एक है. इस बहस से अलग ये एक सच्चाई तो है ही कि पहाड़ों के मौसम अब पहले जैसे तो नहीं हैं. फसल की पैदावार का पैटर्न भी बदला है. गुणात्मक और मात्रात्मक गिरावट दोनों है जिस के चलते बड़े पैमाने पर पहाड़ी जमीन बंजर हो रही है. जीवन की इस वीरानी में एक नया माफिया पनप गया है जो निर्माण से लेकर पलायन तक एक बहुत ही संगठित लेकिन अदृश्य रूप से सक्रिय है.  
उत्तराखंड के पंचेश्वर में दुनिया का दुसरे नम्बर का बड़ा बांध बनाये जाने प्रस्ताव है जो कि अपनी लम्बाई चौड़ाई के मामले में तो बड़ा है ही साथ ही बड़ा है इस से प्रभावित लोगों, परिवारों और गांवों के मामले में भी। यह बड़ा इस मामले में भी है कि सरकारें ये जानने के बावजूद कि यह क्षेत्र भूकम्प के लिहाज से अतिसंवेदनशील जोन-V में आता है. भारत- नेपाल के बीच बेहतर रिश्ते की सम्भावना के लिए विकास की विनाश की ओर ले जाने वाली लहर में एक बहुत ही उपजाऊ क्षेत्र और उसके साथ एक समृद्ध संस्कृति को डुबाएगी. कुल 5040 मेगावॉट की यह परियोजना दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट कही जा रही है. यह इसी साल सितंबर 2018 में शुरू होकर 2026 में पूरी होनी है. इसके लिये दोनों देशों की कुल 14000 हेक्टेयर ज़मीन पानी में समा जायेगी. उत्तराखंड के अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ और चंपावत ज़िलों के कई हिस्से इसके लिए बनने वाले बांध के डूब क्षेत्र में हैं. सरकार की प्राथमिक विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) में करीब 134 गांवों के 54,000 लोगों के विस्थापित होने की बात कही गई है. भूगर्भविज्ञानियों के मुताबिक पंचेश्वर बांध जिस इलाके में प्रस्तावित है वह भूकंप के लिहाज से भी अत्यंत संवेदनशील है. और वे सब समस्याएं जो टिहरी बांध की थीं वे यहां ज्यादा विकराल और ज्यादा बड़े भूभाग में संभावित हैं. ऐसे बांधों की उम्र भी लंबी नहीं बतायी जाती क्योंकि समय के साथ इनमें गाद भरती जाती है जो बांध के ढांचे को कमजोर करती है. क्या सरकारें और उनके विशेषज्ञ इससे अंजान है? ऐसा तो नहीं लगता. फिर इतने बड़े बांध क्यों बनाये जा रहे हैं? जवाब यही है कि विकास के जिस मॉडल को ध्यान में रख कर कदम दर कदम मिलाया जा रहा है उसमें बुनियादी गड़बड़ी है. टिकाऊ और समावेशी विकास जनता को लालच नहीं देता, बल्कि उन्हें भागीदार बनाता है.
ज्यादा बेहतर तो यह होता कि नागरिक आबादी के साथ साथ पर्यावरण और संस्कृति का ख्याल रखते हुए जलविद्युत परियोजनाओं का स्वरूप छोटा किया जाता. 100-150 मेगावॉट की छोटी छोटी जल विद्युत परियोजनाएं स्थानीय आबादी के हितों का पोषण कर सकती हैं. चेक डैम बनाये जाएं. इस से नदियों का प्रवाह भी अवरुद्ध नही होगा. अगर इस अपार जल राशि का दोहन करना ही है तो सिर्फ बड़े बांध ही इकलौता उपाय नहीं हैं. बहुत लंबे समय तक के लिए एक जीवंत भूभाग को धूल, धुएं, सीमेंट-बजरी और पत्थर-गारे के पहाड़ में तब्दील कर देना तो कहीं से भी तर्कसंगत नहीं लगता.
दुनिया में कई जगह अब बड़े बांधों से तौबा की जाने लगी हैं. पन-बिजली और एटमी ऊर्जा को छोड़कर वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर जोर दिया जा रहा है. ये सच है कि दुनिया की 15 फीसदी बिजली पानी से ही आ रही है और पवन चक्की और सौर ऊर्जा सिर्फ चार फीसदी है. लेकिन जर्मनी जैसे देशों ने बड़े बांध न बनाने का निश्चय कर लिया है. भारत और चीन ही इस मामले में अव्वल हैं. बांधों को लेकर एक दूरगामी ठोस नीति की जरूरत है. केन्द्र एवं राज्य के नीति-निर्माताओं एवं विशेषज्ञों को यह जरूर तय कर लेना चाहिए कि जरूरत ऊर्जा की है या पर्यावरण की. या ऊर्जा और पर्यावरण, दोनों के बीच संतुलन बिठाना किस तरह विकास संभव हो सकता है.

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