युद्ध समाधान नही हो सकता कभी भी नही!

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युद्ध समाधान नही हो सकता कभी भी नही! मेरी एक दोस्त है, ग्रेजुएशन के दिनों की। वो हम सब दोस्तों में सबसे खुशमिजाज लड़की थी। पेपर देने के बाद जहाँ हम सब टेंसन में रहते थे और वो, वो पेपर के बाद हर रोज़ हमें गोपेश्वर (चमोली, उत्तराखंड) के शंग्रीला होटल में छोले समोशे खाने ले जाती थी। जिंदगी से भरपूर। हमारे पास करिअर को लेकर तब एक या दो गोल थे उस के पास 8-10 होते थे। और उसने कैरियर ऑप्शन के लिए BSc PCM करने के साथ ही 12वीं बायोलॉजी से भी डाला था ताकि मेडिकल का ऑप्शन भी उसके पास हो जाय। इसी के चलते एक साल बाद वो देहरादून मेडिकल का कोई कोर्स करने चली गयी। और अगले दो साल में उसकी शादी भी हो गयी।  हमें उस वक्त लगा था ये जल्दी है पर वो खुश थी। शादी जल्दी करने  का कारण पूछा तो उसने कहा लड़का एयर फोर्स में है और बहुत अच्छा है तो कर ली। मेरी उस से मुलाकात नही हुई बहुत समय से, लेकिन फेसबुक पर उसकी सुंदर सुंदर फ़ोटो देख हम सब दोस्त खुश होते थे।      अब अभी 20 दिन पहले उसके पति के ऑन ड्यूटी मृत्यु की खबर एक दोस्त ने बताई।  जैसे ही दोस्त ने ये बात बताई मेरे सामने व...

उत्तराखंड में स्वास्थ्य का हाल

उत्तराखंड में स्वस्थ्य सुविधाओं की हालत किसी से छुपी नही है। पहाड़ हो या मैदान दोनों में उन्नीस-बीस का ही अंतर होगा। पहाड़ में महिलाएं पुल पर बच्चे को जन्म दे रही है तो राजधानी देहरादून में अस्पताल के फर्श पर। इधर दून अस्पताल में महिला बच्चे को फर्श पर जन्म दे कर मर रही थी तो कुछ ही दूरी पर विधानसभा में राज्य की विधानसभा का सत्र चल रहा था। जहाँ इन मरती माओं पर बात करने के लिए 1 मिनट का समय भी राज्य की 70 जिन्दा लाशों के पास नही था।
        पहाड़ के कई चमचमाते अस्पतालों में ताले लगे है तो कई अस्पताल नर्स, फार्मासिस्टों की दया पर खुले रहते है। इन जगहों पर किसी मरीज का जुखाम-बुखार का इलाज भी हो जाय तो उसे चमत्कार ही माना जाना चाहिए। गंभीर बीमारी होने पर आपकी जान जानी निश्चित है वो आप पर निर्भर करता है कि आप पहाड़ के अस्पतालों में बिना डॉक्टरों के मरे या पहाड़ के रेफर सेंटरों से जान बचाते बचाते देहरादून के अस्पतालों के फर्श पर। मरना तो तय है पर कहाँ ये आपको तय करना है?
        राज्य सरकारों ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में इतना काम किया है कि न पहाड़ में महिलाएं सुरक्षित है और न राजधानी देहरादून के अस्पतालों में। सब जगह महिलाएं बराबर मर रही है। पहाड़ और मैदान का सारा भेदभाव ही खत्म कर दिया।
      इंसानी माताओं की सुध सरकार को नही है लेकिन इस बार के विधानसभा सत्र में उत्तराखंड की सरकार ने राज्य की विधानसभा होने का दर्जा दिया है जिसमे गाय को राष्ट्रमाता का दर्जा देने का प्रस्ताव पारित हुआ है। पर इस कदम से भी इंसानी माताओं की तरह ही गायमाता की हालत सुधरने वाली नही है।
           "इंसानी माताएँ" बिना डॉक्टर, बिना नर्स, बिना दवा, बिना वेंटिलेटर, बिना बेड, बिना ओपरेशन की सुविधाओं के मरेंगी और राज्य के हर गली मुहल्ले में अख़बार खाती, कबाड़ खाती, पोलीथिन खाती लावारिश "राष्ट्रमाताएँ" किसी से छुपी है क्या?

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