युद्ध समाधान नही हो सकता कभी भी नही!

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युद्ध समाधान नही हो सकता कभी भी नही! मेरी एक दोस्त है, ग्रेजुएशन के दिनों की। वो हम सब दोस्तों में सबसे खुशमिजाज लड़की थी। पेपर देने के बाद जहाँ हम सब टेंसन में रहते थे और वो, वो पेपर के बाद हर रोज़ हमें गोपेश्वर (चमोली, उत्तराखंड) के शंग्रीला होटल में छोले समोशे खाने ले जाती थी। जिंदगी से भरपूर। हमारे पास करिअर को लेकर तब एक या दो गोल थे उस के पास 8-10 होते थे। और उसने कैरियर ऑप्शन के लिए BSc PCM करने के साथ ही 12वीं बायोलॉजी से भी डाला था ताकि मेडिकल का ऑप्शन भी उसके पास हो जाय। इसी के चलते एक साल बाद वो देहरादून मेडिकल का कोई कोर्स करने चली गयी। और अगले दो साल में उसकी शादी भी हो गयी।  हमें उस वक्त लगा था ये जल्दी है पर वो खुश थी। शादी जल्दी करने  का कारण पूछा तो उसने कहा लड़का एयर फोर्स में है और बहुत अच्छा है तो कर ली। मेरी उस से मुलाकात नही हुई बहुत समय से, लेकिन फेसबुक पर उसकी सुंदर सुंदर फ़ोटो देख हम सब दोस्त खुश होते थे।      अब अभी 20 दिन पहले उसके पति के ऑन ड्यूटी मृत्यु की खबर एक दोस्त ने बताई।  जैसे ही दोस्त ने ये बात बताई मेरे सामने व...

कोरोना संकट के साथ ही धार्मिक कट्टरता के खिलाफ भी लड़ने की जरूरत है

संकट ने पूरी दुनिया में तबाही मचा रखी है। और कोरोना के साथ एक और वायरस ने तबाही मचाई है। या यूँ कहे कि कोरोना संकट को बढ़ाने में धार्मिक कार्यक्रमों ने खादपानी का काम किया है तो अतिश्योक्ति नही होगा। धार्मिक कुबुद्धियों को कोरोना संकट के बीच भी मंदिर में पूजा करने, मस्जिद में नमाज अदा करने, और सिक्खों को गुरुद्वारा तो ईसाइयों को चर्च जाना है।  मौत के हर सेकंड बदलते आंकड़े देखने के बाद भी इन्हें भगवान, अल्लाह पर भरोसा है। और ये जहालत केवल भारत मे नही है बल्कि दुनिया के बहुत से देश आज इसका अंजाम भुगत रहे है।


दक्षिण कोरिया उन देशों में शामिल है जहां कोरोना ने सबसे ज्यादा तबाही मचाई है। इसके कोरोना की कहानी में धार्मिक कुबुद्धियों का बड़ा योगदान है। इनकी राजधानी  में स्थित शिन्चोओनजी  चर्च में हुए एक कार्यक्रम ने कोरोना को ऐसी हवा दी कि शुरुआती 31 मामलों के बाद अगले 10 दिनों में संख्या सीधे 2000 पहुँची थी। और फिर कोरोना के कहर में पूरा देश घिर गया।


फ्रांस में भी कोरोना फैलने का कारण एक चर्च में 18 फरवरी से 5 दिन तक चले एक धार्मिक कार्यक्रम को बताया जा रहा है। इस कार्यक्रम में शामिल 2500 लोग कोरोना पॉजिटिव निकले। और उन से ये कोरोना इतना फैला कि 1 अप्रैल तक फ्रांस में 52,128 लोग कोरोना पॉजिटिव हो चुके है।


भारत मे भी कोरोना से संक्रमण की कहानी में जमात का निजामुद्दीन वाला कार्यक्रम बहुत खतरनाक अध्याय बन चुका है। दक्षिण कोरिया और फ्रांस की सरकारों की तरह ही भारत ने भी कोरोना संकट के बीच इतने बड़े कार्यक्रम की अनुमति देना समझ के बाहर है। 2000-3000 लोगों के कार्यक्रम की अनुमति क्यों दी गयी? और अगर इस संकट से पहले अनुमति दे भी दी थी तो अनुमति वापस भी ली जा सकती थी। जब पूरी दुनिया में कोरोना का कहर चल रहा था तब हमारे देश मे कोरोना प्रभावित देशों के लोग धार्मिक कार्यक्रम के लिए वीजा ले कर कैसे आ रहे थे? और अगर आये तो ये एअरपोर्ट की जाँच से कैसे बच निकले?  ये ठीक दक्षिण कोरिया और फ्रांस की जैसी ही गलतियाँ है। वहाँ भी विदेशियों को बिना जाँच के आराम से कार्यक्रमों में शामिल होने दिया गया और नतीजा सबके सामने है। हमारे यहाँ भी मलेशिया और अन्य कोरोना संक्रमित देशों से आये लोग इस संकट के दौर में जमात के कार्यक्रम में शामिल हो गए और हम चुप चाप देखते रह गए और नतीजा अब हमारे सामने है। 


 26 मार्च को तेलंगाना में एक बुजुर्ग की मौत हुई। वो बुखार और आँख में पानी आने की समस्या के लिए डॉक्टर के पास भी गये और डॉक्टर ने बिना जांच किये इन्फेक्शन की दवा थमा दी। जबकि मरने के 9 दिन पहले ही ये बुजुर्ग दिल्ली वाले जमात के कार्यक्रम में शामिल हुए थे और हवाई जहाज से तेलंगाना गए। इनका कोरोना पॉजिटिव होने की पुष्टि मरने के बाद हुई। तब तक राज्य के स्वास्थ्य मंत्री निमोनिया के इलाज की बात कह रहे थे।  अगर दोनों एअरपोर्ट पर सही जाँच हो जाती, अगर डॉक्टर कोरोना जाँच कर देते तो शायद बहुत से लोग कोरोना के संक्रमण से बच सकते थे। लेकिन चूँकि टेस्ट किट ही नही है तो आखिर जाँच किस से करते डॉक्टर? अगर अगर वाली इन्हीं गलतियों ने आज हमें दक्षिण कोरिया और फ़्रांस की जैसी स्थितियों में ला खड़ा किया है।


भारत मे एक और मामला आया इसी तरह का। गुरुबाणी के सभी रागों की जानकारी रखने वाले और पद्मश्री से सम्मानित स्वर्ण मंदिर के पूर्व हजूरी रागी ज्ञानी निर्मल सिंह की कोरोना से मृत्यु 2 अप्रैल को हो गयी है। वो पिछले दिनों विदेश से आये थे और लौटने के बाद से ही दिल्ली और बाकी जगहों पर सम्मेलनों में शामिल हुए। 19 मार्च को अपने घर मे भी एक धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करा गए। अब पता नही उन से कितने लोग प्रभावित हुए लेकिन अगर प्रभावित हुए होंगे तो भारत की संख्या आने वाले दिनों में और रफ्तार पकड़ सकती है।


कोरोना संकट से ज्यादा बड़ा संकट ये धार्मिक कट्टरता है जिस पर पूरी दुनिया को कोरोना संकट खत्म होने के बाद एक साथ सोचना होगा और काम करने की जरूरत है। इस संकट में भी इन की बुद्धि में इतना गोबर कैसे भर सकता है कि अल्लाह तभी खुश होंगे जब नमाज साथ मे 10-20 लोगों को ले कर पढ़ी जाएगी? नवरात्रों में मंदिर में जाना ही है। बिना मंदिर जाए तो पूजा पूरी नही होगी। तो गोबर बुद्धियों कोरोना से बचाने के लिए न भगवान आएंगे न अल्लाह। उस से बचने के बाद कर लेना पूजा पाठ , नमाज सब। पर अभी ठंड रखो।


और अगर ये नमाज वाले पूजा पाठ वाले नही मानते तो सरकार को तत्काल इन पर कार्यवाही करनी चाहिए। और गाजियाबाद के अस्पताल से नर्सों के साथ जमातियों के जो कारनामें सामने आ रहे उस से लग रहा है कि इनके कोरोना का इलाज से पहले दिमागों का इलाज किया जाना ज्यादा जरूरी है। कोरोना से बचने के बाद भी इनकी कट्टरता का जहर समाज के लिए घातक ही होगा।


डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मी इस संकट में सबसे आगे खड़े है। उन के पास इस संकट से बचने वाली ड्रेस नही है न मास्क है लेकिन उसके बावजूद वे हम सब के लिए खड़े है। कभी रेन कोट पहन कर तो कभी बिना मास्क बिना ड्रेस के ही वो इस संकट से लड़ रहे है। लेकिन इंदौर में एक अफवाह के कारण डॉक्टरों पर पत्थर फेंकने वाले लोगों और इस घटना को अंजाम देने वालों पर कठोर कानूनी कार्यवाही की अपील सभी नागरिकों को करनी चाहिए। इन्हें ये सिखाया जाना चाहिए कि इन हरकतों का अंजाम क्या होता है? और आप ये समझिए कि कोरोना धर्म की लड़ाई नही है अगर होती तो इंदौर में जाहिलों से डॉ तृप्ति कटारिया और डॉ जाकिया एक साथ काम नही कर रही होती।


जमात के जो लोग पक्के मुसलमान बनने की कोशिश में लगे है इन्हें समझ नही आ रहा कि इनकी जहालत की सज़ा गरीब मुसलमानों को चुकानी पड़ रही है। अब लोग उन गरीब लोगों को भी उसी शक से घूर रहे है कि कही ये तो कोरोना वाले नही है? जबकि उन बेचारों का रिश्ता न तुम्हारे जहालत से है न तुम्हारी कट्टरता से। उनकी सब्जियों की ठेलियों से अब कोई सब्जी नही खरीद रहा। तो कुल मिला कर जो अच्छा मुसलमान बनने के लिए तुम ये जमात के कार्यक्रम आयोजित कर रहे हो उस से असल मे गरीबों का नुकसान हो रहा है।


इन सब जाहिलों पर कार्यवाही की जानी चाहिए। इस संकट में अपने धार्मिक कर्मकांड घरों के अंदर न कर सड़को, छतों, मंदिरों, मस्जिदों में करने वालों को तत्काल जेल के अंदर किया जाय। इनकी ये नौटँकी हमें फ्रांस और दक्षिण कोरिया के जैसे संकट में ला खड़ा कर सकता है।


इन धार्मिक जाहिलों को तत्काल पहचानिए। सरकार और प्रशासन के सहयोग के लिए तत्काल इन की सूचना दीजिए। डॉक्टरों की PPE ड्रेस के लिए, गरीबों बेरोजगारों के लिए सरकार की योजनाओं के लिए, आर्थिक संकट से निपटने के लिए सरकार से सवाल भी कीजिये। आप डॉक्टरों के लिए केवल ताली ही बजा पाए सवाल नही। इसलिए बिना सुरक्षा उपकरणों के देश के 50 से ज्यादा डॉक्टर इलाज करने के दौरान खुद संक्रमित हो गए है।

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उत्तराखंड में कोरोना से लड़ने के लिए सरकार इतनी मुस्तैद है कि कोरोना टेस्ट किट की जगह HIV टेस्ट किट हॉस्पिटल में भेज रही है। बिहार ने डॉक्टरों के लिए 5 लाख PPE ड्रेस की माँग की केंद्र से तो उसे 4 हज़ार पकड़ा दिए। क्या इस तरह हम कोरोना से लड़ेंगे?  इस लिए सवाल कीजिये। वरना देर न हो जाय!

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आस पास ये भी देखिए कि आपके पास वायरल वीडियो भी आ रहे है जो किसी के खिलाफ नफरतों को बढ़ाने का ही काम कर रहा है न कि इस संकट में कोरोना से लड़ने का। BBC और ऑल्ट न्यूज़ ने थूकने वाले कई फर्जी वीडियो की पहचान की है जो आजकल के नही बल्कि 2 साल पहले के है और आजकल नफरत फैलाने के लिए कई चैनल इन्हें चला रहे है। बर्तन को चाट कर कोरोना फैलाने वाले वाइरल वीडियो को सरकार ने ही पुराना कह दिया है। इन फर्जी संदेशों और वीडियो से भी बचिए और कोरोना से भी।


और हाँ घरों के अंदर रहिए। तभी अपना और सरकार का सहयोग कर पाएंगे। 

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