युद्ध समाधान नही हो सकता कभी भी नही!

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युद्ध समाधान नही हो सकता कभी भी नही! मेरी एक दोस्त है, ग्रेजुएशन के दिनों की। वो हम सब दोस्तों में सबसे खुशमिजाज लड़की थी। पेपर देने के बाद जहाँ हम सब टेंसन में रहते थे और वो, वो पेपर के बाद हर रोज़ हमें गोपेश्वर (चमोली, उत्तराखंड) के शंग्रीला होटल में छोले समोशे खाने ले जाती थी। जिंदगी से भरपूर। हमारे पास करिअर को लेकर तब एक या दो गोल थे उस के पास 8-10 होते थे। और उसने कैरियर ऑप्शन के लिए BSc PCM करने के साथ ही 12वीं बायोलॉजी से भी डाला था ताकि मेडिकल का ऑप्शन भी उसके पास हो जाय। इसी के चलते एक साल बाद वो देहरादून मेडिकल का कोई कोर्स करने चली गयी। और अगले दो साल में उसकी शादी भी हो गयी।  हमें उस वक्त लगा था ये जल्दी है पर वो खुश थी। शादी जल्दी करने  का कारण पूछा तो उसने कहा लड़का एयर फोर्स में है और बहुत अच्छा है तो कर ली। मेरी उस से मुलाकात नही हुई बहुत समय से, लेकिन फेसबुक पर उसकी सुंदर सुंदर फ़ोटो देख हम सब दोस्त खुश होते थे।      अब अभी 20 दिन पहले उसके पति के ऑन ड्यूटी मृत्यु की खबर एक दोस्त ने बताई।  जैसे ही दोस्त ने ये बात बताई मेरे सामने व...

कोरोना में साँस लेने में ही दिक्कत होती है न!

31 मई 2020-2

कोरोना का संकट चल ही रह है। केस लगातार बढ़ रहे है इसके बावजूद भारत मे कल (30 मई को) सरकार ने लॉक डाउन की शर्तों में कुछ छूट के साथ 30 जून तक लॉक डाउन बढ़ा दिया है। कंटेन्मेंट जॉन ( जहाँ कोरोना के केस ज्यादा है) के अलावा 8 जून से बहुत से क्षेत्रों में छूट देने की बात कह दी है। 8 जून के बाद धार्मिक स्थल और शॉपिंग मॉल खुलने की बात कह गयी है फिलहाल। और शिक्षण संस्थानों के लिए जुलाई में निर्णय की बात की है।

ऐसा लग था कि कोरोना के संकट में हम बाकी के भेदभव भूल जाएंगे। जाति, धर्म, रंग, लिंग सब भूल जाएंगे। लेकिन भारत मे हमने देखा कि जब मार्च के बीच में कोरोना के केस बढ़ने शुरू हुए थे तो दिल्ली के निजामुद्दीन मरकज में जमातियों का एक धार्मिक कार्यक्रम में विदेशी जमातियों के कारण संक्रमण फैल गया था। सरकार ने एअरपोर्ट पर जरूरी सावधानियाँ नही बरती और न ही इतनी खबरों के बीच दो-ढाई हजार की भीड़ वाले इस कार्यक्रम को रद्द किया जिस का खामयाजा शुरुआती दिनों में न केवल संक्रमित लोगों को झेलना पड़ा बल्कि मीडिया और सरकार द्वारा जानबूझ कर इसे धार्मिक एंगल दे कर गरीब मुसलमानों को भी इसका असर झेलना पड़ा और उन की सब्जियाँ बेचने और छोटे मोटे काम छीन गए। लोग सब्जी खरीदने से पहले ठेले वाले से नाम और आधार नम्बर पूछने लगे। कि गरीब मुसलमान रोजगार के खातिर अपना नाम हिन्दू नाम मे बदल रहे थे लेकिन आधार कार्ड मांगने पर चोरी पकड़ी गई और फिर देश भर से ऐसी सैकड़ों खबरें आने लगी। खैर अब जब मामले बढ़ गए है तो ये वाला धार्मिक उन्माद मीडिया की स्क्रीन से कम हो गया है लेकिन आम लोगों के जहन से उतना नही गया अब भी। जब उन्माद चल रहा था तो लोग सब्जियाँ नही खरीद रहे थे क्योंकि सब्जी के व्यवसाय में ज्यादातर मुसलमान रहते है।

         आज उस घटना को 2 महीने होने को है। अमेरिका जो दुनिया का सबसे पुराना लोकतांत्रिक देश है में रंगभेद के लिए लोग सड़कों पर है। जबकि ये वो समय है जबकि अमेरिका में सबसे ज्यादा कोरोना के मामले है।  आज 31 मई तक अमेरिका में कोरोना से संक्रमित लोग 1,825,083 है और 105,792 मरने वालों की संख्या है।  जबकि पूरी दुनिया मे मरने वालों की संख्या 367,166 आज के दिन है। यानी एक तिहाई लोग मरने वालों में अमेरिकी है।  जब सब कुछ अंधेरा दिख रहा उस काले घने अंधेरे में भी लोगों को ये याद रह जा रहा कि उन्हें एक दूसरे इंसान से नफरत करनी है।
   उसी अमेरिका में काले लोग रंगभेद के खिलाफ सड़कों पर है। 25 मई को अमेरिका में एक काले निहत्थे अमेरिकी  नागरिक जार्ज फ्लॉयड की पुलिस हिरासत में मौत की खबर के बाद लोग विरोध के लिए सड़कों पर आ गए। इस घटना का एक वीडियो सामने आया है जिसमे एक पुलिसकर्मी डेरेक शैविन, जमीन पर गिरे जार्ज की गर्दन अपने घुटनों से दबा रहे है जबकि जार्ज कह रहे है कि "I can't breathe"( मुझे साँस नही आ रही है)। और अब यही इस आंदोलन का नारा भी बन गया है- "I can't breathe". ऐसा नही है कि ये विरोध केवल जार्ज की हत्या से उपजा वीओढ है बल्कि इस से पहले भी कई अमेरिकी काले नागरिकों की हत्या इसी तरह की जा चुकी है। 


      वाशिंगटन पोस्ट ने जनवरी 2015 से पुलिस की गोली के शिकार लोगों पर एक डाटाबेस बनाना शुरू किया। इस डाटाबेस के अनुसार किसी निहत्थे गोरे व्यक्ति की तुलना में किसी काले निहत्थे व्यक्ति की मौत की सम्भावना चार गुना ज्यादा है। और यही वजह है कि जार्ज फ्लॉयड की मौत के बाद से अमेरिका में विरोध प्रदर्शन हो रहे है।

   मैंने सुना था कि एक महामारी समाज मे बहुत से बदलाव लाती है उसके बाद लोग अलग तरह से सोचते है और उनके जीवन जीने का तरीका बिल्कुल बदल जाता है लेकिन देख रही हूँ लोग मरने की देहली पर खड़े है लेकिन अपने अंदर वही पुरानी असंवेदनशीलता, नफरत लेकर। उनके आस पास मौत का जमघट लगा है लेकिन वे अपने अंदर नफरत का जमघट लिए है। शायद जब ये कोरोना बीत जाएगा तब क्या पता वो महामारी के बाद वाला बदलाव आये, शायद उसमें अभी वक्त है!


 #ICan'tBreathe

#CoronaMemory

#LockDownDiary

#JusticeforGeorgeFloyd

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